साहित्य

ग़ज़ल

फ़ैज़ अहमद "मीम"

मुश्किलें टल न सकेंगी तिरे घबराने से
मसअले सारे सुलझ जाते हैं सुलझाने से

तेरे दम से है ज़माना ये भरम मत रखना
कार ए दुनिया न रुकेगा तिरे मर जाने से

ये शब ए वस्ल ख़ुदारा न करो अब ज़ाया
यार हर बात बिगड़ जाएगी शर्माने से

क्या उसे मेरी मुहब्बत की ज़रूरत ही नहीं
उसको मिलता है भला क्या मुझे तड़पाने से

सब्र करने के सिवा और कोई रस्ता नहीं
ख़त्म होंगे न कभी ग़म तिरे उकताने से

लोग मासूम समझते हैं उसे फिर भी यहाँ
बाज़ आता नहीं वो दिल पे सितम ढाने से

इस ज़माने पे अयाँ होने न दो अपना ग़म
लोग लेते हैं मज़ा ‘मीम’ बिखर जाने से

फ़ैज़ अहमद “मीम”
आरा, बिहार

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