साहित्य

ग़ज़ल

वाई.वेद प्रकाश

कदम – कदम पर भारी है बाजार सखे।
उसकी मस्ती सब पर तारी है बाजार सखे।
देवदूत बनकर आया है राजा अपना भी,
बेंच रहा जग का सब कुछ आभारी है बाजार सखे।
दे पानी की कीमत ख़ून जहां का लेना बस,
दुनिया की कैसी खुद्दारी है बाजार सखे।
पाल लिया उसने भी सबको अपने दड़बे में,
कहां जाओगे बचकर के लाचारी है बाजार सखे।
समय कहां छोड़ेगा तुमको अपने वश में करने से,
छायी जग में बड़ी मक्कारी है बाजार सखे।
कदम – कदम पर यूं कैसे कोई जी पायेगा भी,
सब बंद रास्ते जीने के व्यभिचारी है बाजार सखे।
सदियां बीत गई करते बस उन्हें गुलामी ही,
लौट समय फिर आया संसारी है बाजार सखे।

वाई.वेद प्रकाश
द्वारा विद्या रमण फाउंडेशन
शंकर नगर, मुराई बाग, डलमऊ, रायबरेली उत्तर प्रदेश 229207
9670040890

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