
पैसे की सरकार हमारा क्या है,
पूँजी का अधिकार हमारा क्या है।
अपना घर हो उजियारा चाहे,
जनता हो लाचार हमारा क्या है।
परिवार बिखरते हर दिन कलह करे ,
आँसू का आभार हमारा क्या है ।
सत्ता की गलियाँ उनके हैं नारे,
भूखा रह लाचार हमारा क्या है।
अधिकार लिखे कागज में ही भर कर,
जीवन बे-आधार हमारा क्या है।
मझधार फँसी नाव हमारी कैसे ,
फिर भी है परिवार हमारा क्या है।
सपने हों नीलाम सुमन के सारे,
नींदे गिरवी पार हमारा क्या है।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा
मुजफ्फरपुर, बिहार




