साहित्य

गुब्बारावाला

जयचन्द प्रजापति 'जय'

 

रात में
एक गुब्बारावाला
बेच रहा था गुब्बारा

आधीरात थी
सड़को पर
कुछ ही लोग थे
जो आ जा रहे थे

वह इस उम्मीद से
इतनी रात में
गुब्बारे बेच रहा था

कुछ और बिक जायेंगें
कुछ सब्जियां ले लेंगें

नहीं तो
सूखी रोटियां खाकर
अगले दिन फिर गुब्बारा
बेचना पड़ेगा
अगले आधी रात तक।
….

जयचन्द प्रजापति ‘जय’
प्रयागराज

कविता का भावार्थ

यह कविता जयचंद प्रजापति ‘जय’ की है, जो आधुनिक हिंदी कविता की उस धारा का प्रतिनिधित्व करती है जहाँ रोज़मर्रा की ज़िंदगी की कठोर वास्तविकताओं को संवेदनशीलता से उकेरा जाता है। ‘गुब्बारावाला’ में आधी रात के सन्नाटे में गुब्बारे बेचने वाले एक गरीब विक्रेता की उम्मीद और निराशा का चित्रण है, जो सामाजिक-आर्थिक विषमता को दर्शाता है।

कविता की सादगी इसकी ताकत है—छोटे-छोटे वाक्यों और दोहराव (‘गुब्बारा बेच रहा था’, ‘गुब्बारा बेचना पड़ेगा’) से वह निरंतर संघर्ष की लय पैदा करती है। गुब्बारा, जो बचपन और खुशी का प्रतीक है, यहाँ विडंबना बन जाता है: आधी रात में बिकने वाले खिलौने से सब्ज़ी या रोटी जुटाने की बेबसी। प्रयागराज की गलियों का परिवेश इसे स्थानीय और प्रामाणिक बनाता है, जो पाठक को शहर की निचली तहों की झलक देता है।

यह कविता साहित्यिक रूप से छायावाद से हटकर छायावादी यथार्थवाद की याद दिलाती है, जहाँ निराला या मुक्तिबोध की परंपरा में मजदूर वर्ग की पीड़ा व्यक्त की गई है। जयचंद प्रजापति की अन्य रचनाओं की तरह यहाँ भी व्यंग्य सूक्ष्म है—गुब्बारों की चमक बनाम ज़िंदगी की फीकी रोटियाँ।

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