
धन्य घड़ी, धन्य आज की बेला, गूँजा मंगल गान है जी,
सुखपाल सिंह गुरुजी आएँ, कविता का सम्मान है जी।
राजस्व के प्रहरी होकर, न्याय-सत्य की राह चले,
शब्द-शिखर के शिल्पी बनकर, “काव्य तीर्थ” कह लें जी।
कलम बनी जब दीप शिखा, तम का हर अंश जला है जी,
अनुभव, साधना, तप से जिनका, हर एक स्वर उजला है जी।
मंच-मंच पर गूँजे स्वर जब, भावों का संसार सजे,
गुरु-वाणी में राष्ट्र-चेतना, संस्कारों के द्वार सजे जी।
आज मनाया गुरु जी संग, उल्लासों का पर्व महान,
स्नेह-संयम की छाँह तले, खिला परिवार-आँगन जान।
एक दीया, दो उजियारे, जन-मन करते आलोकित जी,
संबंधों में संस्कार रचे, जीवन होता शोभित जी।
आयु बढ़े, यश फैले जग में, स्वस्थ रहें हर श्वास सदा,
सुखपाल सिंह गुरुजी, भाई साहब जीवन हो प्रकाश सदा।
जन्मदिवस की मंगल वेला, शत-शत नमन, अभिनंदन जी,
काव्य-धरा के पथ-प्रदर्शक को, कोटि-कोटि अभिनंदन जी।
दिनेश पाल सिंह दिलकश
जनपद संभल उत्तर प्रदेश




