साहित्य

जाते हुए वर्ष में परिवर्तन क्या खास हुआ

राम किशोर वर्मा

नदी किनारे बैठ गया मैं, कागज और कलम लेकर ।
कहाँ खड़ा था, कहाँ खड़ा हूँ, जाता साल मुझे देकर ।।१।।
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एक दृष्टि डाली तो मैंने, जस के तस पर्वत पाये ।
पेड़ों पर कुछ फूल खिले थे, कुछ पौधे थे मुरझाये ।।२।।
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हाल वही दिखता था मुझको, दिनकर सब पर छाये थे ।
झरने पहले जैसे अब भी, नदिया बीच समाये थे ।।३।।
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रंग बदलता आसमान है,धरती पर पगडंडी हैं ।
जंगल में भी बनती बस्ती, मगर दूर अब मंडी है ।।४।।
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देखा जब सारे दृश्यों को, मुझको यह आभास हुआ ।
जस-का-तस सब वैसा ही था, परिवर्तन कब खास हुआ ।।५।।
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नये नियम-कानूनों ने भी, कुछ का बंटाधार किया ।
निर्धन की तो मौज रही पर, मध्यम जन पर भार दिया ।।६।।
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बड़े-बड़े लोगों का क्या है, उनकी तो चाँदी कटती ।
नौकरशाहों की मुश्किल से, थोड़ी तनख्वाह बढ़ती ।।७।।
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धूल चटाई दुश्मन को भी, दहशत दी आतंकी को ।
मान बढ़ाया देशों में भी, बंद किया नौटंकी को ।।८।।
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जाते हुए साल को कहता, मैं इसीलिए आभारी ।
कमियाँ जितनी भी रह जातीं, न रहेंगी आगे सारी ।।९।।
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नववर्ष के आगमन पर है, हर जन मन की अभिलाषा ।
प्रेम बढ़ेगा, काम बनेंगे, होगी तब मीठी भाषा ।।१०।।
-राम किशोर वर्मा
रामपुर (उ०प्र०)
दिनांक:- २९-१२-२०२५ सोमवार

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