साहित्य

नज्म

सत्यवान साहब

बस मेरी इनायत की सज़ा दी गई उसे
खुलेआम मोहब्बत की सज़ा दी गई उसे

पहलू में था जो, मेरे लुटाया गया वहीं
इक चाँद अँधेरों में डुबाया गया कहीं
पहरा बिठा के जुल्म का मासूम दिल पे यूँ
हर हुस्न की कीमत की सज़ा दी गई उसे
खुलेआम मोहब्बत की सज़ा दी गई उसे

की मुझसे दोस्ती तो खरोचा गया उसे
लफ़्ज़ों से ज़ख़्म दे के दबोचा गया उसे
फिर भी न कुछ कहा मेरे खिलाफ इसलिए
दुनिया से बग़ावत की सज़ा दी गई उसे
खुलेआम मोहब्बत की सज़ा दी गई उसे

इक रूह की नसों में धुआँ घोलते हुए
मंजर भी चुप था सांसों को टटोलते हुए
यूँ रौंद के ख्वाहिश जो रही दिल की, भला क्यूँ
जीने की भी चाहत की सज़ा दी गई उसे
खुलेआम मोहब्बत की सज़ा दी गई उसे

जो लोग कह रहे थे कि हम साथ खड़े हैं
कंधों पे उसके ही वो डुबो करके चढ़े हैं
शायद ये दर्द सह के भी वो आह भर रही
है भी अगर वो ज़िंदा तो हर रोज़ मर रही
जिसने न खिलाफत की किसी जुर्म की कभी
हर बार शराफ़त की सज़ा दी गई उसे
खुलेआम मोहब्बत की सज़ा दी गई उसे

मिट्टी में दफ़्न करके फना कर चुके हैं लोग
भौंरे से फूल को तो जुदा कर चुके हैं लोग
फिर भी ख़याल बन के वो लफ़्ज़ों में गूँजता
ख़ुशबू की तरह गीतों में हर सम्त महकता
क़ब्रों के दर पे आ के सिसकती न मोहब्बत
कुछ यूं ही इबादत की सज़ा दी गई उसे
खुलेआम मोहब्बत की सज़ा दी गई उसे

~सत्यवान साहब
मो. 8053097182

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