साहित्य

जीवन की जंग

सुमन बिष्ट

ज़िंदगी ठहरती नहीं, थामे रहती साँसों की डोर,
गर रुकावटों के बीच भी बना रहे हौसला पुरज़ोर।

बुझती नहीं वह लौ कभी, जो मन में जली हो,
अँधेरों के बीच भी जिसने राहें नई गढ़ी हों।

भले ही हम थक जाएँ,पाँवों में चुभ जाए शूल,
समय का पहिया घूमता रहता बदले हर उसूल।

टूटें अगर सपने कभी, तो बिखरने मत देना,
गिरकर फिर उठ जाना ही, जीवन का है कहना।

भले ही झूठ का शोर हो ,सच की आवाज़ मंद न हो,
झूठ के गहन अंधकार में सच का सूर्य उदय हो।

बँटे नहीं हम ईर्ष्या द्वेष में, एकता का हो भाव
प्रेम की डोर पकड़े रहे हम , हो दयालु स्वभाव।

सोच में जड़ता न रहे, प्रश्नों में हो धार,
चेतन मन से ही खुलते, नए सृजन के द्वार।

पंख थके हों फिर भी जो उड़ने का साहस दिखाए,
भविष्य वही लिखता है,जो बिना डरे आगे बढ़ जाए।

जब वेदना के गीतों से भी उपजे मधुर सुर,
तब आँसू बनकर मोती, स्पष्ट कर दें अंतर।

हार के क्षण सिखलाते हैं जीत की सच्ची राह,
टूटे मन में भी पलती है नई सुबह की चाह।

चलते रहना ही कर्म है, थमना नहीं तेरा काम ,
कदम-कदम पर गढ़ता है, मनुष्य अपना नाम।

कल क्या होगा यह सोचकर, आज न खो जाए,
वर्तमान की लौ से ही भविष्य का दीप जलाए।

भले ही क्षण भर के लिए, कहीं जो हम ठहर जाएँ,
नदी की धारा की तरह समय निरंतर बहता जाए।

नदी के प्रवाह में सीखें, जीने का हर ढंग,
रुकते नहीं हैं जो कभी, वही जीते जीवन की जंग ।

सुमन बिष्ट, नोएडा

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