ज्यों कुम्हार माटी से घड़े को देता स्वरूप,
त्यों युगल के नेह-योग उपजे बालसरूप।
जुगत औ परिश्रम ही कच्चा घट गढ़ता है,
ऊर्जा में पक-पक कर मनुज मन भरता है।
माना कि पकने पर भी घड़ा रहे कमज़ोर,
पर बालरूप है शाश्वत का अंश पुरजोर।
संस्कार -संस्कृति रच-रच डाले मात-पिता,
बन कुम्हार का रूप, जीवन की हर बात।
देता कुम्भकार हमको स्व कला – सौगात,
हम देते संसार में निज अंश को औकात।
पाकर अस्तित्व स्व का वह भी सृजन करें,
जन्म जन्मांतर अनन्त तक चलती लीला,
सृजनात्मक विचार विकास औ अनुशासन,
यही तो कारीगरी जीव से नवजीवन बनें।।
सुषमा श्रीवास्तव
रूद्रपुर, ऊधम सिंह नगर, उत्तराखंड।




