साहित्य

कलम मेरी पहचान

पूनम त्रिपाठी

कलम कोई साधारण औज़ार नहीं,
यह मेरे भीतर की सच्चाई की जुबान है,
जो मैं कह न सकूँ शब्दों में,
वही मेरी कलम की पहचान है।

काग़ज़ पर उतरते ही
दर्द भी अर्थ पा लेता है,
टूटे हुए ख़्वाबों को
कलम नया रास्ता दे देता है।

जब दुनिया सवालों में उलझी रही,
मेरी कलम ने उत्तर लिखे,
जब आवाज़ दबाने की कोशिश हुई,
मेरे शब्दों ने सच के शब्द लिखें

न दौलत की चाह, न नाम का घमंड,
मेरी पूँजी ही बस एहसास है,
हर अक्षर में जीया हुआ जीवन,
हर पंक्ति में मेरा विश्वास है।

कभी माँ की ममता बनकर बहती,
कभी पिता का मौन त्याग लिखती,
कभी समाज की पीड़ा बोलती,
तो कभी टूटे मन को सहलाती।

मेरी कलम ने मुझे
खुद से मिलना सिखाया है,
अंधेरों में भी उम्मीद का
एक दीप जलाया है।

मैं मिट जाऊँ समय की धूल में भले,
पर शब्द अमर हो जाएँगे,
मेरी पहचान मेरे नाम से नहीं,
मेरी कलम से पहचाने जाएँगे।

पूनम त्रिपाठी
गोरखपुर ✍️

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