
फूलों की तरह कोमलता
पत्थर की तरह कठोरता
रुई की तरह मुलायमन
पानी की तरह शीतल
कोयल की आवाज़ की तरह
मधुरता
धरती तूने भी कितना कुछ दिया
पर हम न कर सके
तेरा बचाओ
हमने और पाने की लालसा में
तुझे ही कुर्बान कर दिया
हमने खुद को उजागर कर
तुझे डुबाया है
कभी सुनामी तो कभी बाड़
सिर्फ़ हमारे कारण ही आए हैं
तुझे खत्म कर हमने
महल बनाये
है धरती यह इंसान की फितरत है
की सबसे लेकर
कुछ नहीं देना
और फिर सब खत्म होने का
अफसोस करना
धरती तुझे भी हक है
क्रोधित होने का
और सबको दिखा देना का
कितने गलत है मनुष्य जो
समझने पर भी
नहीं समझे
अब समय है
सबकी सिखा देना का
रिया राणावत
झाबुआ मध्य प्रदेश




