
कोमल कल्पनाएँ
मन के आँगन में
ओस की बूँद बन
हर सुबह मुस्काती हैं,
और दिन भर की कठोरता
धीरे-धीरे पिघल जाती है।
जब शब्द थक जाते हैं
भाव स्वयं बोल उठते हैं,
कोमल कल्पनाएँ
हृदय के सूने कोने में
दीपक बन
चुपचाप उजाला कर जाती हैं।
न रंग की माँग,
न आकार की जिद,
कोमल कल्पनाएँ
बस एक स्पर्श चाहती हैं—
विश्वास का,
जो उन्हें उड़ान दे सके।
जीवन की धूप में
जब सपने झुलसने लगते हैं,
कोमल कल्पनाएँ
छाया बनकर
थाम लेती हैं
थके हुए मन को।
हर यथार्थ से परे
एक संसार रचती हैं,
कोमल कल्पनाएँ—
जहाँ असंभव भी
धीरे से कहता है,
“मैं संभव हूँ।”
डाॅ सुमन मेहरोत्रा
मुजफ्फरपुर, बिहार




