साहित्य

लोक नाट्य शैली-नौटंकी

कृतिकार-चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा "अकिंचन"

नौटंकी लोक नाट्य विधा क एक अइसन बिचवई
रहल,जेमे न खाली कथा,कहानी,प्रेमालाप रहल साथे कवितईअउर गायकी क भी रिवाज बहुते मजबूती से रहल।अइसन कहल जाला कि लोग बतौर टिकट देखे वालन से नौटंकी क चंदा वसूले लगलन,ऐहि से एकर नाम नौटंकी पड़ल। एक समय रहल जब भक्त पूरन मल,शीत बसंत,भक्त प्रह्लाद,दिखावे वाले नौटंकी- मंडली क धाक होत रहल।नौटंकी देखे क शौकीन ऐके देखे बदे दूर ले चल जायें।लोग बाग क इ कहन रहल कि पहिले पहिले जउने खेल में नौ नगाड़न क इस्तेमाल अउरओपर एक साथे टंकार,कइल गइल त ओही खेल नौटंकी कहलाइल।हालाकि इहो लोकोक्ति
बुझाला,नौ नगाड़न क बात कहीं लिखल पढ़ल नाहीं मिलल,बकि नौटंकी में एकर पुष्टि जरुर होला। अगर नौटंकी में से नौ नगाड़न के निकार दिहल जा त उ नौटंकी ना हो के अउर कुछ होई।नौटंकी में सबसे ढे़र मुखरित होला,सेकल गइल तासा, नगाड़ा क रिद्मिक चोट। कहल जा सकेला कि नगाड़ा नौटंकी क पहिला जरुरत ह यानी कि नौटंकी खेल के शुरुआत क पहिला आगाज,कोसन दूर दराज के लोगन के उ जगही पे पहुँचले क बुलावा/दावतनामा/नेवता ध्वनि के जरिये। बहुत पहिले,इया कहल जा सकेला कि “रास भगत”अउर “स्वाँग” परम्परा में जब “शहजादी” नौटंकी क प्रेम परक प्रस्तुति कइल गइल त ओके बहुत लोकप्रियता मिलल।कई कई बार खेला क दौर चलल।ओकरे बाद से ही इ खेला के नौटंकी कहले क रिवाज भइल होई। नौटंकी के बारे में पंजाब में एगो लोक कथा प्रचलित ह कि- नौटंकी नाम क एगो सुन्नर राजकुमारी रहल जउन सिंहलद्वीप क राजकुमारी जइसन प्रसिद्ध रहे। अइसन कहल जाला कि शिकार से लौटल फूल सिंह नाम क एक युवक अपने भौजाई से कुछ खाये पीये के परोसे के कहलस,परजाई के देवर क हुकुम नामा तेवर नाहीं सुहाइल,त उ आपन गुस्सा जाहिर कइके बोली बोललस कि-हुकुम त अइसन चलावत बाटे,जइसे नौटंकी के ही ब्याह के लाइल होखे।..
..
फूलसिंह के इ बात चूभ गईल।कहल जाला कि फूलसिंह घोडा़ पे अशर्फियन के लाद के चल पड़ल,
नौटंकी के ब्याहे खातिर।ओकरे दिल दिमाग में बस
एक नाम छाइल रहल “शहजादी नौटंकी”।फूलसिंह
नौटंकी के बाग में पहुँचल,मालिन से जान पहचान
बनइलस,जउन रोज एक माला गूँथ के शहजादी ख़ातिर ले जा। एक दिन उ खुद ही मालिन के अवजी
में शहजादी खातिर करीने आ खूबसूरती से माला गुँथलस (जाने के चाहीं की चौसठ कला में एक कला
माला गूँथल भी मानल जाला)।
सखुन कड़े देवर कहौ, क्यों हुए बौरान।
किस बिरते पर करी है,इतनी गुस्सा आन।।
इतनी गुस्सा आन,चलाते हुक्म यहाँ आये हो।
ऐसे बोलोबोल आप,किसदिमाग में छायेहो।।
लौंडी बाँदी मोय जानो जो,सतराये हो क्या।
मिज़ाज इतना,क्या ब्याह के नौटंकीलायेहो।।
( नौटंकी शहजादी )
मालिन हार लेके शहजादी के लगे जाले। अलग किसिम क इ माला देख के जब शहजादी पुछलस कि-“आज इ माला के गुँथलस ह? “मालिन अपने बहू
क नाम बता देले।शहजादी ओके आदेश देहलस कि हम ओसे मिलल चाहत हईं।फूलसिंह नारी क स्वाँग धरि के सामने पेश भइल।फूलसिंह क मंशा भी यही
रहल।कहल जाला कि फूलसिंह भी नारी के रुप में
शहजादी से उन्नीस नाहीं रहल। नौटंकी ओके आपन
प्रिय सहेली बना लेले अउर अपने रतन जित पलंग पे भी सुतले बइठले क अधिकार दे देले।फूलसिंह मन पार के स्त्री स्वर में शहजादी नौटंकी से अबले बियाह
न कइले क कारन पूछेला।शहजादी अपने माफिक वर न मिलले बात कहेले अउर एक ठंडा आह भरके
आपन इच्छा बतलइलस कि-काश हम दूनो में से
केहू एक मरद हो जात।एही बात पे फूलसिंह,नौटंकी से अपने देवी देवता के मना के आपन आँख बंद कइके इहे वरदान माँगे के कहलस कि-” हम दुनहूँ में से कोई एक मरद हो जात।” …

कहल जाला कि नौटंकी वइसही कइलस अउर फूल सिंह मर्द रुप में हाजिर।जब इ खबर राजा ले पहुँचल
त फूलसिंह के कैद कर लिहल जाला, साथे-साथे ओकरे वध क भीआदेश हो जाला।नौटंकी अपने प्रिय के खातिर मर्दाना वस्त्र पहिर के वध स्थल पे पहुँच जाले,अउर जइसही जल्लादन के वध क आदेश मिलेला,उ साम,दाम,दण्ड,भेद सेअपने असली रुप में आके अपने प्रिय के बचा लेते।अन्त में फूलसिंह नौटंकी से ब्याह रचा,अपने घरे चल जाला।शहजादी आख्यान पंजाब,सिंध,गुजरात,राजस्थान के साथे हाथरस,मथुरा,वाराणसी,कानपुर,लखनऊ,आदि क्षेत्र में भी फइलल रहल राजस्थानी लोकगाथन क “फूलन दे रानी”अवधी क्षेत्र क लोककथा “फुलवा रानी”सब नौटंकी के नाम से ही जानल जाला।अवध क नवाब वाजिदअली शाह भीअपने के नृत्य अउर नाट्य से जोड़ रखले रहलन।अइसन कहलजाला कि उ रहस परम्परा के तउर पे राधाकृष्ण पे भी प्रहसन लिखलें अउर खुद एक किरदार के तउर पे खेलले भी रहलन।बकौल अतुल,नवाब क इ “रहस लीला”स्वाँग परम्परा (नौटंकी क पहिले क विधा अउर स्वरुप)के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देहलस।अपने शासन काल में उ केसरबाग में रहसमंजिल क स्थापना कइलेरहलन। उनके परीखाना में२१६.रहसवालियाँ रहलिन।नौटंकी गीत नाट्यविधा क अदाकारी ह।उत्तर प्रदेश क सहारनपुर,मुजफ्फरनगर,हाथरस,मेरठ, शाहजहाँपुर, एटा,कानपुर,लखनऊ,कन्नौज,मथुरा,अउरआगरा आदि में एकरे परम्परा क चलन एक लम्बा अरसा ले रहल।सहारनपुर,मेरठअउर मुजफ्फरनगर में इ विधा के”स्वांग”नामसे शाहजहाँपुर अउर एकरेआसपास के क्षेत्र में “नकल”नाम से,हाथरस,इटावा,एटा इलाका में “साँगीत”नाम से अउर कानपुर,लखनऊ,कन्नौज, मैनपुरी,आगरा अउर इलाहाबाद के इलाका में “नौटंकी” नाम से रेखांकित कइल गइल बा। 🙏

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