
कमल दल पर आसीन शारदे, श्वेत प्रभा मुस्कान भरी ।
हंस संग करती पथ-निर्देशन, जग में ज्ञान प्रकाश धरी।
शुभ्र वसन में शोभित माते, करुणा रस की धार बहे ।
नेत्रों में करुणा दीप जले, अज्ञान-तम सब दूर कहे।
वीणा की मधुर तान सुहानी, हृदय कमल को खोल गई ।
शब्द-सुर-लय की त्रिवेणी से, चेतनता नव डोल गई।
हस्तों में ग्रंथ सुशोभित शोभा, विद्या का उद्घोष करें ।
माला-जप से साधक के मन, संयम-संस्कार पोषें।
मस्तक पर शुभ्र मुकुट शीतल, वाणी अमृत-धार बनी ।
सत्य-सौंदर्य-शिव का संगम, कविता में अवतार बनी।
माँ वागेश्वरी कृपा बरसाओ, लेखनी को वरदान मिले ।
छंद-यति-गति की मर्यादा में, शब्दों को सम्मान मिले।
बुद्धि-विवेक का बीज जमाओ, अहंकार का नाश करो ।
कवि-मन को कर पावन माते, सर्जन का आकाश भरो।
कमल चरणों में शीश नवाऊँ, भाव-भक्ति अर्पित करूँ ।
माँ सरस्वती की वंदना में, जीवन कृतार्थ मैं करूँ।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा
मुजफ्फरपुर, बिहार




