साहित्य

मानवता सत कर्म ज्ञान बिन, मंजिल ना कोई पा पाये

डॉ उषा अग्रवाल जलकिरण

 

मानवता पहचान बनी है, कहें ऋषि मुनि ज्ञानी।
इसको समझे जब है कोई, अंतस कहे कहानी।
धर्म कर्म के साथ बढ़े जब, जग में बढ़ता जाये।
इस जग में सफल वही रहता, जो इसको अपनाये।

संस्कारों को निज सिखा रहा, पथ को सुगम बनाता।
नहीं भटकता प्राणी पथ से, शुभिता मन भर जाता।
जीवन बगिया संस्कृति से हो, हरदम प्रेम जताये।
इस जग में सफल वही रहता, जो इसको अपनाये।।

मानवता का गुण मानव में, सेवा भाव से आता।
सद्भावों से जोरखते है, सदा बड़ो से नाता।
छोटे और बड़ो में कोई, फर्क नजर ना आये।
इस जग में सफल वही रहता, जो इसको अपनाये।।

मानवता से ही प्राणी के ,मन में करुणा जागे।
काम किसी के तब जीवन में,करता निशदिन आगे।
दुनियां के मेले में प्राणी, मर्म समझ जो पाये।
इस जग में सफल वही होता, जो इसको अपनाये।।

डॉ उषा अग्रवाल जलकिरण
छतरपुर मध्यप्रदेश

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