धर्म/आध्यात्म

मौनी अमावस्या 2026: मौन, संयम और सामाजिक चेतना का शास्त्रसम्मत संदेश

ज्योतिषाचार्य अरुण कुमार मिश्र

काशी के अक्षांश पर निर्मित पंचांग के अनुसार माघ कृष्ण अमावस्या तिथि का प्रवेश 17 जनवरी 2026, शनिवार को रात्रि 11:52 पर हो रहा है और इसका समापन 18 जनवरी 2026, रविवार को रात्रि 01:08 तक रहेगा। उदय-व्यापिनी तिथि के सिद्धांत के अनुसार अमावस्या 18 जनवरी को ही प्रभावी मानी जाती है। अतः मौनी अमावस्या का पर्व सम्पूर्ण भारत में रविवार, 18 जनवरी 2026 को ही मनाया जायेगा। तिथि को लेकर किसी भी प्रकार का भ्रम शास्त्रीय दृष्टि से निराधार है, क्योंकि अलग-अलग अक्षांश को लेकर बनने वाले पंचांग में समय का अलग होना स्वाभाविक हैं।

मौनी अमावस्या सनातन धर्म की उस परंपरा का प्रतिनिधित्व करती है, जहाँ आस्था को अंधविश्वास नहीं, बल्कि अनुशासित जीवन-पद्धति के रूप में देखा गया है। माघ मास को शुद्धि, संयम और लोककल्याण का काल माना गया है और अमावस्या तिथि व्यक्ति को बाह्य कोलाहल से हटाकर आत्मावलोकन की ओर ले जाती है। मौन-व्रत का आशय केवल न बोलना नहीं, बल्कि अनावश्यक प्रतिक्रिया, कटु वाणी और मानसिक उथल-पुथल से विराम लेना है।

आज जब समाज शब्दों की अति, मतों की उग्रता और डिजिटल शोर से ग्रस्त है, मौनी अमावस्या का संदेश सीधा और स्पष्ट है—कम बोलें, अधिक समझें और विवेकपूर्ण आचरण करें। यह पर्व स्मरण कराता है कि वाणी की मर्यादा टूटते ही संबंध, समाज और व्यवस्था सभी असंतुलित हो जाते हैं। मौन विवेक को पुनः केंद्र में लाता है और व्यक्ति को उत्तरदायित्वबोध से जोड़ता है।

वैज्ञानिक दृष्टि से भी मौन और संयम के लाभ निर्विवाद हैं। मानसिक तनाव, आवेग और निरंतर उत्तेजना से जूझते मस्तिष्क को मौन विश्राम देता है। सात्त्विक आहार, उपवास और प्रातःकालीन स्नान शरीर की जैविक लय को संतुलित करते हैं। यह कोई अंध परंपरा नहीं, बल्कि पीढ़ियों के अनुभव से विकसित जीवन-विज्ञान है।

मनोवैज्ञानिक स्तर पर मौनी अमावस्या आत्मनियंत्रण की परीक्षा है। जो व्यक्ति स्वयं पर नियंत्रण नहीं रख सकता, वह समाज या व्यवस्था को दोष देने का अधिकारी नहीं हो सकता। मौन क्रोध को धार देता नहीं, बल्कि उसे शांत करता है। यही कारण है कि सनातन परंपरा ने आत्मसंयम को सामाजिक शांति की पहली शर्त माना है।

सामाजिक दृष्टि से यह पर्व दान, सेवा और संवेदनशीलता का स्मरण-पर्व है। अन्नदान, वस्त्रदान और आवश्यकता अनुसार सहायता केवल धार्मिक कर्म नहीं, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व हैं। मौन का सामूहिक भाव संवाद को मर्यादित बनाता है और टकराव की संस्कृति पर अंकुश लगाता है।

मौनी अमावस्या हमें यह स्पष्ट संदेश देती है कि समाज का पतन शोर से शुरू होता है और उत्थान संयम से। यदि यह पर्व केवल स्नान और औपचारिक कर्मकांड तक सीमित रह गया, तो उसका उद्देश्य अधूरा रह जायेगा। वास्तविक साधना वही है, जिसमें वाणी संयमित हो, व्यवहार शुद्ध हो और दृष्टि लोकमंगल की ओर हो।

ज्योतिषाचार्य अरुण कुमार मिश्र

(सनातन धर्म तथा संस्कृति के प्रेरक वक्ता व
अध्यक्ष – माँ शारदा वेलफेयर सोसाइटी)
संपर्क सूत्र: +91-9450276488

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!