
गरुड़ पुराण में आरती और प्रसाद
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सनातन भारतीय परंपरा में आरती और प्रसाद केवल उपासना की औपचारिक क्रियाएँ नहीं, बल्कि वे ऐसे धर्म-संस्कार हैं जिनमें व्यक्ति, समाज और परमात्मा—तीनों का समन्वय दिखाई देता है। गरुड़ पुराण, जो वैष्णव दर्शन का गूढ़ और व्यवहारिक ग्रंथ है, प्रत्यक्ष रूप से “आरती” शब्द का प्रयोग भले न करे, किंतु दीपदान, नीराजन, स्तुति, नैवेद्य और दान के माध्यम से इसके शास्त्रीय आधार को दृढ़ता से स्थापित करता है।
गरुड़ पुराण में दीप को ज्ञान और पुण्य का प्रतीक बताया गया है।यही दीपदान और आरती का आधार है।गरुण पुराण में लिखा है कि –
दीपो ज्ञानस्वरूपोऽयं तमोघ्नः पापनाशनः।
दीपदानात् परं पुण्यं न भूतं न भविष्यति॥
अर्थात् दीप ज्ञानस्वरूप है, अज्ञान-तम का नाशक है और दीपदान से बढ़कर कोई पुण्य न हुआ है, न होगा।
आरती इसी दीपदान का सामूहिक और भावनात्मक रूप है, जहाँ प्रकाश के माध्यम से ईश्वर का नीराजन किया जाता है।
पुराणों में ईश्वर की स्तुति को पूजा का प्राण कहा गया है—
स्तोत्रेण पूज्यते देवो न द्रव्येण कदाचन।
भावशुद्धिर्महापूजा सर्वपूजाफलप्रदा॥
अर्थात् देवता द्रव्य से नहीं, स्तुति और शुद्ध भाव से पूजित होते हैं।आरती में गान, वादन और स्तुति—तीनों के माध्यम से यही भाव-साधना होती है।
भोग से प्रसाद तक गरुड़ पुराण में नैवेद्य को अत्यंत पवित्र और मोक्षदायक बताया गया है—
नैवेद्यं विष्णवे दत्तं भक्त्या यत् क्रियते नरैः।
सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति॥
अर्थात् भक्ति-भाव से विष्णु को अर्पित नैवेद्य मनुष्य को समस्त पापों से मुक्त कर विष्णुलोक का अधिकारी बनाता है।देवता को अर्पित होने के पश्चात वही अन्न प्रसाद कहलाता है—
देवदत्तं तु यद्भोज्यं प्रसाद इति कथ्यते।
तद्भुक्त्वा मुच्यते जन्तुः पापराशेः सुनिश्चितम्॥
गरुड़ पुराण दान को धर्म का आधार मानता है—
दानं धर्मस्य मूलं स्यात् दानात् सर्वं प्रतिष्ठितम्।प्रसाद-वितरण दान का ही सूक्ष्म, किंतु प्रभावी रूप है। इसमें किसी प्रकार का भेद स्वीकार्य नहीं—
न प्रसादे भवेच्छेदो जाति-वर्ण-विचारतः।
देवकृपाविभागोऽयं सर्वेषां सम एव हि॥
अर्थात् प्रसाद में जाति-वर्ण का विचार नहीं होना चाहिए, क्योंकि यह देवकृपा का समान वितरण है।गरुड़ पुराण के श्राद्धकांड में विष्णु-पूजा और प्रसाद का विशेष महत्त्व है—
विष्णवे यन्निवेद्यं स्यात् ब्राह्मणेभ्यः प्रदीयते।
तेन तृप्यन्ति पितरः सत्यं सत्यं न संशयः॥
अर्थात् विष्णु को अर्पित अन्न जब ब्राह्मणों और अतिथियों में वितरित किया जाता है, तो उससे पितर निश्चित रूप से तृप्त होते हैं।
कर्मकांड से लोकमंगल तक गरुड़ पुराण की दृष्टि में पूजा का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत मोक्ष नहीं, बल्कि लोकमंगल है—
न स्वार्थाय समारम्भो धर्मस्योक्तो मनीषिभिः।
लोकसंग्रह एवायं धर्मस्य परमं फलम्॥
आरती जहाँ व्यक्ति के भीतर के अज्ञान का नाश करती है, वहीं प्रसाद समाज में करुणा, समता और सहभागिता का विस्तार करता है।
इस प्रकार गरुड़ पुराण में आरती ज्ञान-दीप का नीराजन है और प्रसाद उस ज्ञान का सामाजिक वितरण। दोनों मिलकर धर्म को संकीर्ण कर्मकांड से ऊपर उठाकर मानवीय मूल्य बनाते हैं।आरती से अंतःकरण आलोकित होता है,प्रसाद से वही आलोक समाज में प्रस्फुटित होता है।यही गरुड़ पुराण की शाश्वत शिक्षा,भक्ति, जब तक लोक से नहीं जुड़ती, तब तक पूर्ण नहीं होती।
– डॉ.उदयराज मिश्र



