
मेरे हिस्से अगर कुछ आया,
तो बस कल्पनाओं की उड़ान आई,
और प्रतिक्षाओं की लंबी राहें,
जो हर पल बस तुम्हारे होने का
एहसास दिला गईं।
मेरी हर कल्पना में
तुम बिन कहे ही साथ चलते हो,
और प्रतिक्षाएं
हर सांस के साथ
एक नई उम्मीद बोती हैं।
कभी तो तुम्हें
मेरी खामोशी सुनाई देगी,
कभी तो समझोगे
इस मन के अनकहे भाव,
कभी तो कल्पनाएँ
हकीकत का रूप लेंगी,
और प्रतिक्षाओं की थकान
आख़िरकार खत्म होगी।
और अगर फिर भी
ये उम्मीदें सच न बन पाईं,
तो भी कोई शिकवा नहीं,
क्योंकि मेरे हिस्से
कुछ अनमोल तो आया—
इन कल्पनाओं में
तुम्हारा साथ,
और इन प्रतिक्षाओं में
तुम्हारा एहसास।
तृषा सिंह
देवघर,झारखंड




