
ऐसी की गुरुवर ने किरपा, मेरे मोह का बंधन तोड़ दिया।(टेक)
दौड़ रही दिन रात सदा, जग में सब काज सँवारन को ।
स्वप्न में विश्व दिखाके मुझे मेरे चंचल चित्त को मोड़ दिया।।1।।
कोई नाना नाम रटे, कोई पूजे है पीर पैगम्बर को ।
सब पंथ-ग्रंथ छुड़ा करके इक ईश्वर में मन जोड़ दिया ।।2।।
कोई ढूँढ रहा मथुरा नगरी, कोई जा काशी में वास करे।
ब्रह्माण्ड में व्याप्त से मिलकर के, सर्व मर्म का भंडा फोड़ दिया ।।3।।
लालच, तृष्णा,लोभ औ मोह,
दुनिया है माया की नगरी।
सबसे ऊपर उठ ज्ञानचक्षु खुला,
अज्ञान का पर्दाफाश किया।।4।।
क्या गुरुदेव के चरणों में भेंट करूँ,देख सकूँ ना त्रिलोकन में ।
ब्रम्हानंद समान न होय कोई,सुख, वैभव सुषमा लाख करोड़ दिया ।।5।।
सुषमा श्रीवास्तव, रूद्रपुर, ऊधम सिंह नगर, उत्तराखंड।।




