
मुझको अब उठना होगा,
ख़ुद से अब लड़ना होगा।
टूटे सपनों के शीशे से,
नया जहाँ गढ़ना होगा।
रात बहुत अब देखी है,
सूरज को छूना होगा।
हार की चादर ओढ़े मन को,
हिम्मत से झकझोरना होगा।
कल तक जो मैं रुका रहा,
आज वही बदलना होगा।
डर की हर एक ज़ंजीर को,
अपने हाथों तोड़ना होगा।
काँटों से डर कर रुक जाएँ,
ऐसा नहीं बनना होगा।
चलते-चलते गिर भी जाऊँ,
फिर भी आगे बढ़ना होगा।
मुझको अब उठना होगा,
अपने जीवन को संवारना होगा।
कुलदीप सिंह रुहेला
सहारनपुर उत्तर प्रदेश



