साहित्य

कवियन क दिलजानी कविता

चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा "अकिंचन "

हिरण्यगर्भ क ज्योति कलश छलकावे जइसे सविता,
हियअँचल से उभरल,आ प्रकटल प्रज्ञा लौ ह् कविता।
कवियन के लय धुन पे थिरके,इ नाचे मधुरिम कविता,
छंद-बंध क जब नूपुर रीझत, तब पैदा होले कविता।
हियचित्त जबआकुल होवेले,सिसकारी भरेले कविता,
टीस उठेले जब जियरा में,नयनन से टपकेले कविता।
हिम श्रृंगन से झरझर झरिके,इ बहेले बन के सरिता,
भाव तरंगिनी, हिय स्पंदन से उपजेले बनके कविता।
कठिनाई जिनगीजबआवत,सुझिआवत जइसेबनिता,
भूत,भविष्य,त्रिकाल सुधारे,त्रिपथगा हवय् इ कविता।
रसश्रृंगार जब नूपुर पागे,मृदुझंकारन,विस्तारेशुचिता,

वीरबहूटी जब रणमें उतरे,चमकेले असिधारीकविता।
प्रानन क हम करीं न्योछावर,देश क भक्ति सिखावे कविता,
नीमन राह दिखावे दुनिया के,वसुधा ह परिवार बतावे कविता।
ना केवल केशव,बिहारी, विद्यापति,के प्रकटावे इ कविता,
चंदबरदाई,जगनिक,भूषन के भी उपजावेला इ कविता।
भक्ति के रस में जब डूबेला,ब्रह्मनाद सुनावे ले इ कविता,
गोरख कबीर तुलसी रैदास सूर मीरा के भी देवेले इ कविता।
शत शत नमन ह तोहके हे ! कविता,
कवियन क,तू दिलजानी हे!कविता।।
नमन ह,नमन ह,नमन ह हे! कविता।
✍️चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा “अकिंचन “

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