साहित्य

मुकरी

चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा "अकिंचन"

उमड़ि घुमड़ि करि गाये कजरिया,नील बदन-ढ़ांपि पतुरिया,
देहियां छुइले सिहरावन लागे, नियरे सटले बिजुरी डहकावे।
ऐ सखि!सच कह मोर ह किरिया,
कउन ह तिरिया?ना सखि बदरा।।
उषा तजि संध्या लगि धाई,चैन रैन कछु किंचा ना पाई ,
एक टांग रथ सगरि हंकाई, जउन रथी दुई नारि रखाई।
ऐ सखि! कहतू समझ के आपन,
का सखि साजन?ना सखि सूरज।।
सूरज के संग बढ़ि चढ़ि आई, सूरज के पिछवइले जाई,
सूरज जब कपरा चढ़ि बोली,तबि फौरन समरस हो जाई।
ऐ सखि!कइसन ह हरजाई?
ना सखि सबकर ह परछाई।।
जल के अन्दर करहिं निवासा, एक बूंद करि जलकन आशा,
कउन नक्षत्र क जातक अइसन,मुंह में बनजा मोती जइसन।
ऐ सखि!चलत चकोर क बाती?
ना सखि पावन जल ह स्वाती।।
केहु सागर बसि लेहि जम्हाई, केहु हिम अंचल बैठि बसाई,
रागी बैरागी कैसहु जामाता, ससुरे बसजा का यही सुहाता।
ऐ सखि!बिटिया बसे न नइहर,
चाहे ओकर साजन हो हरिहर।।
✍️-चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा “अकिंचन”, गोरखपुर।
चलभाष -9305988252

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