साहित्य

नफ़रत का बीज बोकर

भुलक्कड़ बनारसी

नफ़रत का बीज बोकर कोई बच रहा कैसे,
किस तरह हिम्मत कर रहा और सज रहा कैसे।

घर में मातम छाया है पर सीकन कहाँ उसे,
दुख की घड़ी में भी तकरार कर रहा कैसे।

जिस देश में हिंसक जानवर भी पूजे जाते,
उस देश में नीरिह जानवर कट रहा कैसे।

अपना देश तो विकास की राह पर बढ़ रहा,
फिर न जाने मुल्क जाति धर्म में बट रहा कैसे।

हवा का कीला बना लोग आगे बढ़ते जा रहे,
उन लोगों को चैन की नींद लग रहा कैसे।

इंसानियत के दुश्मन यहाँ तमाम घूम रहे,
फिर भी शरीफ उनके साथ सट रहा कैसे।

भुलक्कड़ सिर्फ नाम का लगता भुलक्कड़,
तमाम पुराने मित्रों का नाम जप रहा कैसे।

भुलक्कड़ बनारसी

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