
नई साल नई सुबहा चहुँ ओर
कुहरे की चादर ओढ़े ये भोर
ठंडी हवा की सिरहन चुभ आई
दशो दिशा को अंधेरों में छुपाई
काँप रहा पक्षियों का रैन बसेरा
जाड़े की ठंडक डाले है डेरा
कैसी ठंडक ये नई साल ले आई
ढूँढ रही है तन वदन गरम रजाई
बाँस के टहनी से ये टपकता पानी
शबनम पे छाई है आज मस्तानी
पीपल का पत्ता कोहरे से घबराया
ये ठंडी हवा कहाँ से मुसीबत लाया
अम्बर पे सूरज चेहरा ना दिखलाये
कोहरे की चादर में मुँह क्यूँ छिपाये
नव वर्ष कैसी विहान लेकर आई
प्रकृति चारों ओर ओस से नहाई
चलो आग जलायें सब जन मिलकर
आने में अभी देर है गगन के दिनकर
मित्रों नववर्ष की स्वीकार करो बधाई
सन छ्ब्बीस देख दरवाजे पे है। आई
उदय किशोर साह
मो० पो० जयपुर जिला बांका बिहार




