
मालूम नहीं कल क्या होगा
कुछ याद रहे ना रहे
बस एक तुम्हारा
नाम याद रहेगा।
जो पुल बनाया था हमने
सपनों भरी आँखों के
वे डूब गये हैं,
आँसुओं के सैलाब में।
जो लिखा था नाम
रेत पर हमने,
उसे मिटा दिया है
रेत की सीलन ने ।
कुछ ऐसा हो कि
सूरज की कोई किरन
फिर से गर्म कर दे,
रेत की सीलन
वक्त ये काम कर दे।
कभी ऐसा भी हो जाए
सब कुछ बदल जाए।
आने वाला कल
एक खूबसूरत सी
किताब बन जाए।
मंजुला शरण ‘मनु’
राँची, झारखण्ड़।



