साहित्य

नवगीत

मंजुला शरण ' मनु '

रंग नहीं कोई पानी का
रूप नहीं कोई पानी का ।

अनमोल मोल पानी का ।

कट रहे रोज वन -जंगल,
नोट-वोट के सब मंगल ।
राज -व्यपार सभी का दंगल ,
पर्यावरण का हुआ अमंगल !

रंग नहीं कोई पानी का
अनमोल मोल पानी का ।

कंक्रीटों के बढ़े बाजार ,
खुली हवा का हुआ व्यापार ।
बदल गए शहर के चेहरे ,
हुए सब शतरंज के मोहरे ।

अनमोल मोल पानी का ,
“मेघा दे गुड़ धानी का ।”

मानव श्रम बंट गए मशीनों में,
अपशिष्ट बहे नदियों में।
व्यर्थ बह रहा पानी घरों से ,
खुले छूट रहे नलके घरों के ।

दावानल क्या जाने मोल पानी का ,
अनमोल मोल पानी का ।

पर्यावरण हो रहा दूषित ,
कैसे रखें अब सुरक्षित ?
अपव्ययना हो पानी का।
अनमोल मोल पानी का ।

अनमोल मोल पानी का,
रंग नहीं कोई पानी का ।

मंजुला शरण ‘ मनु ‘
राँची , झारखण्ड़ ।

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