
ओ मधुमास मेरे हृदय में करो तुम वास
वन उपवन की तरह हमें भी मानो खास
कलियों की ऑचल में मेरा है निवास
वरसों से लगाये बैठा मैं तेरी ही आस
पतझड़ की गुलामी हमें भी नहीं मंजूर
वशंवाद की सलामी भी है हमें नामंजूर
स्वतंत्र हिन्द का मैं हूँ सच्चा मजकूर
जी हजूरी कभी भी कुबुल ना है हुजूर
खिला खिला महका तेरा तन वदन
तुम्हें देख मुस्कुरा रहा है गुलमन्द
तुमको चमन करता है बेहद ही पसन्द
तेरे चरण में है बस आनन्द ही आनन्द
पहाड़ों को ये चंचल हवा चूम कर आई
अपने साथ सौरभ की भंडार महकाई
तेरे संग संग दौड़ रही है अल्हड़ पुरवाई
फिजां में मस्ती की लहर है अब छाई
कितना पावन है तेरा ये शांत जीवन
धड़क रहा है हर युवा का हृदय उमंग
सांसों में बसा है जग के जन जन
हे मधुमास तुम्हें मेरा भी है। नमन
उदय किशोर साह
मो० पो० जयपुर जिला बांका बिहार




