साहित्य

पिंजरे का पंछी

सुमन बिष्ट

आज एक सवाल पूछना है,
औरत की आज़ादी का सवाल,
घरेलू औरतें हैं ज्यादा आज़ाद या,
कामकाजी उनसे ज़्यादा आज़ाद।

घरेलू नारी करती घर के काम हैं,
धूमधाम से मनाती हर त्योहार हैं,
हर रिश्ते को प्यार से निभाती हैं,
तो क्या वो पिंजरे की पंछी हैं?

कामकाजी रोज़ दफ़्तर जाती हैं,
हर बार समय से बँधी रहती हैं,
हर त्योहार में भी छुट्टी माँगती हैं,
तो क्या वे घर से बाहर आज़ाद हैं ?

बताओ ना आज़ादी क्या है?
क्या आज़ादी का मतलब सिर्फ़,
घर से बाहर जा पैसा कमाना है?
या फिर खुलकर जी पाना है ?

घरेलू महिला के पास गर समय है,
तो लोग हर बार यही कहते हैं,
“तुम तो कुछ करती ही नहीं हो”
अपनी सखियों संग मस्त रहती हो।

लेकिन ये कौन कहता है
किटी पार्टी करना है अकारण
और ओवरटाइम करना है
नारी का सशक्तिकरण?

कामकाजी नारी के पास पैसा है,
पर अपने लिए समय नहीं।
फिर भी सब उससे कहते हैं
“नारी तू सशक्त है।”

घर कभी पिंजरा था ही नहीं,
और नौकरी भी ज़रूरत नहीं थी
दीवारें पिंजरा तब बनती है,
जब औरत से कुछ पूछा न जाए।

औरत को हिस्सों में मत बाँटो
घरेलू, नौकरीपेशा,आज़ाद,क़ैद।
हर औरत को हक़ व अधिकार है
अपने लिए ज़िंदगी चुनने का।

हर महिला के लिए आज़ादी
अपनी मनमर्ज़ी से जीना है
सम्मान, समय और चुनाव
अपने मन मुताबिक करना है।

अब ये सवाल औरत से नहीं है
एक सवाल समाज से करना है
हे समाज के पहरेदारों बताओ..
तू ख़ुद किस पिंजरे में जी रहा है?

सुमन बिष्ट, नोएडा

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