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डोर ईश के हाथ में , उनके हाथ पतंग।
ऊँची उड़े पतंग तब, खिल जाते हर रंग।।१।।
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ढील खीच देते वहीं , ऊँची उड़े पतंग।
इस पतंग सी जिन्दगी, लड़ती अपनी जंग।।२।।
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पर्व भला संक्रांति का ,आने को तैयार।
ऊँची उड़े पतंग अब,नभ होगा गुलज़ार।।३।।
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डोर जोत मजबूत हो,ऊँची उड़े पतंग।
तभी चले परिवार घर,मिल बैठे सब संग।।४।।
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जग में सब मिलकर रहें,ऊँची उड़े पतंग।
भूख मिटे संसार से,जिएं खुशी के संग।।५।।
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पुरुषोत्तम सरसोदिया मनज
इंदौर मध्यप्रदेश
स्वरचित/मौलिक
मोबाइल नं ९४२५३५९८३६
ग्राम टू डे में प्रकाशनार्थ



