
रोज़ ठान कर सोता हूं
सुबह जैसे ही अलार्म बजेगा
कूद कर उठूंगा बिस्तर से।
जल्दी से होकर तैयार
साइकिल लेकर निकल जाऊंगा
खुली हवा में, मस्त वाले मौसम में
पैडल तेज घुमाऊंगा।
पर होता बस इतना है
अलार्म बजता है सुबह
अधखुली आंखों से देखता हूं
घड़ी को कोसता हूं
और सोचता हूं, अभी तो रात थी
इतनी जल्दी सुबह हो गई
नींद न हुई पूरी और
अलार्म की घंटी बज गई।
फिर ओढ़कर कंबल मैं
आगोश में चला जाता हूं
भाड़ में जाए दुनिया
थोड़ा और सो जाता हूं।
©संजय मृदुल




