साहित्य

प्राकृतिक सौंदर्य

डॉ गीता पांडेय अपराजिता

आया है ऋतुराज सखि, प्रकृति करे है शोर।
नाचें गाएँ झूम के,करे मदन है जोर।।
करे मदन है जोर,सभी उत्साहित दिखते।
खुशियांँ मिले अपार,प्रेम आपस में करते।।
गीता भी खुशहाल,देख उनकी है काया।
तिरपनहवा बसंत,आज जीवन में आया।।

भाता सबको है जगत, प्रकृति भरे जब रंग।
हृदय प्रफुल्लित हो सदा, कुसुमाकर के संग।।
कुसुमाकर के संग,पीत सरसो लहराती।
कर धरती श्रृंगार,रूप पर है इठलाती।।
गीता को अति गर्व,मीत बन भाग्य जगाता।
सब करते अनुराग,आगमन सबको भाता।।

आकर्षित सबको करे,कहते उसे बसंत।
सब ऋतुओं का है बना,जग में यह तो कंत।।
जग में यह तो कंत,प्रेम सबसे है करता।
अनुपम छटा बिखेर,रंग सबके उर भरता।।
गीता में उत्साह,देख सबको है हर्षित।
खींचें अपनी ओर,प्रकृति मनहर आकर्षित।।

आओ मिल संकल्प ले,करें प्रकृति विस्तार।
आएँगी फिर लौट कर, खुशियांँ सबके द्वार।।

खुशियांँ सबके द्वार, लुभावन हो जग सारा।
दिग दिगंत का रूप,लगे अतिशय है प्यारा।।
गीता की शुचि चाह,वृक्ष चहूँ ओर लगाओ।
करो नहीं अब देर,निकल बाहर सब आओ।।

डॉ गीता पांडेय अपराजिता
सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश

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