
प्रसिद्ध वैदिक विचारक आचार्य धर्मवीर के अनुसार सिद्धार्थ गौतम,जैन महावीर,आजीवक, चार्वाक,वाममार्ग आदि को वेदविरोधी बनाने में उस समय के कुछ निठल्ले सनातनी विद्वानों का ही हाथ था। आलस्य,प्रमाद और स्वार्थवश उन्होंने वेदों का अध्ययन अध्यापन छोड़कर अपने नये नये पौराणिक ग्रंथों का निर्माण करना शुरू कर दिया।उन ग्रंथों में काफी कुछ ऐसा था,जो वेदविरोधी, उपनिषद् विरोधी और दर्शनशास्त्र विरोधी था। उसमें बलि,नारी निंदा, मूर्तिपूजा, मांसाहार,कोरा कर्मकांड, काल्पनिक कहानियों तथा व्यक्ति पूजा का प्राधान्य था। सिद्धार्थ गौतम, जैन महावीर,आजीवक, चार्वाक,वाममार्ग आदि ने प्रश्न उठाने शुरू किये कि बलि,नारी निंदा, मांसाहार आदि क्यों है?इस पर पौराणिक पंडितों ने झूठे ही कहना शुरू कर दिया कि यह सब वेद में दिया गया है।यह सुनकर सिद्धार्थ गौतम,जैन महावीर,आजीवक, चार्वाक, वाममार्गियों ने कहा कि फिर हम ऐसे वेदादि ग्रंथों को नहीं मानते। यदि सिद्धार्थ गौतम,जैन महावीर,आजीवक, चार्वाक,वाममार्गी वेदादि ग्रंथों को पढ लेते तो सारी समस्याओं का अपने आप ही समाधान हो जाता। लेकिन उन्होंने भी आलस्य,प्रमाद और स्वार्थवश ऐसा नहीं किया और बिना पढ़े ही वेदादि शास्त्रों का विरोध करना शुरू कर दिया।बाद में यह परंपरा चल गई।बाद में इनके अंधानुयायियों की भी वेदादि शास्त्रों का विरोध करने की अंधपरंपरा सी बन गई।वेदादि शास्त्रों का विरोध करने वाले निष्पक्षता से इनका अध्ययन अध्यापन करने के लिये कोई भी प्रयास नहीं करते हैं।
इस अंधपरंपरा का लाभ उठाकर बाद के बौद्ध मतावलंबियों, स्वयं पौराणिक पंडितों, विदेशी विचारकों, विदेशी विश्वविद्यालयों और इनका अंधानुकरण करने वाले समकालीन भारतीय लेखकों तथा शिक्षकों ने सनातन शास्त्रों, भारतीय इतिहास, सभ्यता और संस्कृति के संबंध अनाप-शनाप कुछ भी लिखना शुरू कर दिया है।यही सब कुछ आजादी के पश्चात् भारतीय शिक्षा संस्थानों में पढ़ाया जा रहा है। यदि कोई इस मूढ़ता का विरोध करे तो उसे परंपरावादी, पिछड़ा हुआ और रूढ़िवादी कहकर अपमानित किया जाता है। यदि सनातन धर्म और संस्कृति के ग्रंथों में कुछ आपत्तिजनक लगता है तो उसका विरोध करो। इससे किसी को आपत्ति नहीं है। सनातन धर्म और संस्कृति में तो वैचारिक स्वतन्त्रता का प्रावधान हजारों वर्षों से मौजूद है। लेकिन विरोध के नाम पर सब कुछ को बकवास, व्यर्थ और अव्यवहारिक तो नहीं कहा जाना चाहिये।एक किसान खेत से खरपतवार निकाल सकता है लेकिन खरपतवार के साथ फसल को भी उखाड़कर फेंक देना कौनसी समझदारी का काम है? सनातन धर्म, सभ्यता,संस्कृति,दर्शनशास्त्र,योग अध्यात्म तथा इसके हजारों वर्षों पुराने साहित्य का विरोध करने वालों की हालत उपरोक्त किसान की तरह ही है।
युनानी विचारक सुकरात ने ज्ञान को ही सद्गुण कहा है।कहा जाता है कि सुकरात की पत्नी जिनथप्पे बड़ी क्रूर थी।वह सुकरात को परेशान करती थी।उसे प्रतिदिन मारती थी।जब चाहे उसका अपमान करती थी। शिष्यों के बीच बैठे सुकरात के पास आकर उसे डांटती डपटती थी।हर तरह से वह सुकरात को दुखी और पीड़ित देखना चाहती थी।एक बार तो शिष्यों के बीच बैठे सुकरात के ऊपर उसने उबलते पानी की केटली उढेल दी थी। इससे सुकरात का एक तरफ का चेहरा पूरी तरह से जल गया था।किसी ने सुकरात से विवाह करने या नहीं करने के संबंध में पूछा तो सुकरात ने कहा कि आपको विवाह अवश्य करना चाहिये। यदि पत्नी अच्छी भलि मिली तो जीवन स्वर्ग बन जायेगा। लेकिन यदि पत्नी मेरे जैसी मिली तो तुम मेरी तरह से दार्शनिक बन जाओगे। कहां याज्ञवल्क्य की पत्नी गार्गी और मैत्रेयी शास्त्रनिपुण और शास्त्रार्थ में शिरोमणि थीं और कहां सुकरात की पत्नी जाहिल,उज्जड, अनपढ़ और आतंकी प्रकृति की थीं?यह भेद दोनों प्रकार की संस्कृतियों का भेद है। अब्राहमिक परंपरा में नारी में आत्मा नहीं माना गया है, जबकि सनातन परंपरा में नारी को सम्मानित स्थान प्राप्त रहा है।
किसी विचारक की कुछ पंक्तियों को कहीं बीच से निकालकर अपनी सुविधा और स्वार्थ अनुसार उनके अर्थ का अनर्थ करते हुये इस्तेमाल करना परले दर्जे की महामूर्खता का परिचायक है।हीन और सर्वोच्च भावना से ग्रस्त लोग अक्सर ऐसा करते हुवे देखे जा सकते हैं। किसी लेखक की पंक्तियों को इस प्रकार बीच से निकालकर प्रयोग करना उस लेखक के साथ साहित्यिक और वैचारिक बलात्कार कहा जायेगा।इस तरह से किसी विषय के संबंध में उस लेखक की मूल भावना को नहीं समझा जा सकता। किसी लेखक के जीवन-दर्शन के संबंध में यह बिल्कुल ग़लत,अधकचरा, भ्रमित और बालवत् प्रयास है।विद्यालयों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों, शैक्षणिक भवनों, राजनीतिक भवनों, व्यापारिक ठिकानों,पुलिस स्टेशन, आश्रमों,योग केंद्रों,भारतीय सेना आदि के कार्यालयों की दीवारों पर ऐसे शिक्षाप्रद कहे जाने वाले वचन लिखे हुये मिलेंगे। विभिन्न धर्मगुरुओं द्वारा भी इस प्रकार के वाक्य गांव- कस्बे-, शहरों में दीवारों पर लिखवाये जाते हैं। लेकिन सच मानिये कि ऐसे शिक्षाप्रद कहे जाने वाले वाक्य,कथन, उपदेश,लोकोक्तियां,मुहावरे आदि दो चार दिन तक पढ़ने में आते हैं। पंद्रह बीस दिन के बाद तो वो दिखलाई देना ही बंद हो जाते हैं। ये शुरू- शुरू में सनसनी उत्पन्न करते हैं।बाद में ये अनदेखे कर दिये जाते हैं।मानव मन की यही विशेषता है।
जब इन आदर्श वाक्यों का यही बुरा हाल होना होता है,तो फिर इनके लिखने का क्या फायदा? भवनों की दीवारों को गंदा भी क्यों किया जाता है?जब कोई अधिक समय तक इनको पढता नहीं है,तो क्यों दीवारों को पोता जाता है? बच्चे पुस्तकें तो पढ़ते नहीं हैं,इन वचनों को क्या खाक पढ़ेंगे।यह सोचनीय है।
इस प्रकार के छोटे-छोटे आदर्श कहे जाने वाले वाक्य या उपदेश या लोकोक्तियां किसी लेखक,कवि, दार्शनिक या विचारक की विचारधारा की मूल भावना का प्रतिनिधित्व बिल्कुल भी नहीं करते हैं।एक वाक्य के कुछ शब्दों में किसी महान कहे जाने वाले व्यक्ति की देशना को अभिव्यक्त करना असम्भव है।वह व्यक्ति इन वाक्यों को लिखने में तब समर्थ हुआ होगा,जब उसने इसके लिये सालों तक तपस्या की हुई होगी।जिस व्यक्ति ने ऐसा कुछ भी शारीरिक, मानसिक या बौद्धिक परिश्रम नहीं किया है,वो कैसे इन आदर्श वाक्यों के रहस्य को समझकर इन्हें जीवन में उतार पाने में सफल होगा?
जब कोई महान साहित्यकार, दार्शनिक,विचारक, नेता या लेखक कुछ लिखता है तो उसके पास संघर्ष की एक पृष्ठभूमि होती है।उस पृष्ठभूमि पर ही वह लेखक ऐसा बोलने के लिये समर्थ हुआ है।उस पृष्ठभूमि को तैयार करने के लिये कितना संघर्ष किया गया होगा, कितने पापड़ बेले होंगे,कितनी कठिनाईयां आईं होंगी तथा कितने लोगों ने टांग खिंचाई की होगी -इसको केवल वह व्यक्ति ही जानता और समझता है। कहीं से निकालकर दीवारों पर लिखा हुआ या फिर किन्हीं संगठनों के आदर्श वाक्य के रूप में स्वीकार किये हुये को पढ़कर कोई सामान्य व्यक्ति कैसे प्रेरणा प्राप्त कर सकता है?यह लगभग असम्भव लगता है। और यदि हजारों में से किसी एक व्यक्ति को कुछ प्रेरणा मिलती भी होगी तो सच मानिये यह बड़ा घाटे का सौदा है।वह अकेला व्यक्ति तो इन वाक्यों के बगैर भी कहीं न कहीं से प्रेरणा प्राप्त कर ही लेगा। उसके लिये इन वाक्यों को लिखकर दीवारों को गंदा करने तथा रुपये खर्च करने की कोई जरूरत नहीं है।
कहीं ऐसा तो नहीं है कि चालाक किस्म के शिक्षाविदों, शिक्षकों, राजनेताओं और सुधारकों ने जनमानस को बेवकूफ बनाने के लिये यह सब शुरू किया हो।जिन- जिन शिक्षाविदों, शिक्षकों, राजनेताओं और सुधारकों ने अपने खुद के जीवन के आचरण में इन आदर्श वाक्यों को स्थापित नहीं किया है, कहीं उन्होंने अपनी नाकामियों को छिपाने के लिये तो यह सब शुरू नहीं कर दिया होगा? क्योंकि यदि किसी राष्ट्र के नेता, धर्मगुरु, सुधारक,शिक्षक,प्रोफोसर,अधिकारी , व्यापारी आदि का आचरण सही होगा, तो यह सही आचरण ही जनमानस को सही रास्ते पर प्रेरित करने के लिये काफी रहेगा।इसके लिये दीवारों को पोतने की या कार्यालयों के द्वारों पर लिखवाने की या कुर्सी के ऊपर अंकित करने की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन क्योंकि हर क्षेत्र में कथनी और करनी में भेद विद्यमान है,शायद उसकी पूर्ति के लिये आदर्श वाक्यों से दीवारों को पोतने का यह सब नाटक किया जाता होगा। निष्पक्षता से अवलोकन करने पर लग तो यही रहा है।आप किसी भी समाचार पत्र के मुखपृष्ठ का अवलोकन कीजिये।उस पर उसके ध्येय वाक्य को लिखा हुआ पाओगे। उन ध्येय वाक्यों में निस्वार्थता,निष्कामता,निष्पक्षता, निडरता,बेबाकी,सत्यवादिता, यथार्थता, आदर्शवादिता आदि जैसे मोटे -मोटे शब्दों से बने आदर्श वाक्य लिखे हुये मिलेंगे। लेकिन हकीकत बिल्कुल विपरीत मिलेगी। अधिकांशतः उपरोक्त वाक्यों की उपेक्षा करते हुये चापलूसी, कायरता, गुलामी,दासता,जी -हुजूरी,धन-लोलुपता,कायरता और पूर्वाग्रह को मौजूद पाओगे।
जिनके हाथों में किसी भी प्रकार की शक्ति,सत्ता या अधिकार मौजूद हैं, उनके लिये ये आदर्श वाक्य निज सुरक्षा के लिये ढाल का काम करते हैं। इससे उनकी चरित्रहीनता,भ्रष्टाचरण और कामचोरी का भांडाफोड होने पर पर्दा ढका रहता है।जब बाहर इतना महान वाक्य लिखे हुये हैं,तो भीतर बैठे हुये लोग भी इसी तरह के आदर्शवादी होंगे। लेकिन हकीकत में ऐसा कुछ होता नहीं है। लिखे हुये आदर्श वाक्यों के विपरीत ही होता हुआ देखा जाता है। सत्यमेव जयते,योग: कर्मशु कौशलम् , बहुजन हिताय बहुजन सुखाय, सत्यं शिवं सुंदरम्,धर्मचक्रप्रवर्तनाय,यतोधर्मस्ततो जय:,असतो मा सद्गमय,शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम् , तेजस्वी नावधीतमस्तु,यत्र विश्वं भवत्येकनीडम्। आदि आदि आदर्श वाक्यों का अवलोकन करके प्रामाणिकता की जांच की जा सकती है।लिखे गये आदर्श वाक्यों के अनुसार नेताओं, धर्माचार्यों, सुधारकों, प्रबंधकों, शिक्षकों का आचरण होता नहीं है, इसलिये इस प्रकार मोटे-मोटे वाक्य दिये जाते हैं, ताकि जनमानस को इनके वास्तविक चरित्र का पता न चल सके और इनकी मनमानी पूर्ववत् चलती रहे।
आपने बखूबी देखा होगा कि कुछ लोग धाराप्रवाह संस्कृत शास्त्रों के श्लोक, रामचरितमानस की चौपाइयां,कबीर की साखियां, बाईबल के कथन, त्रिपिटक के वचन,जैनागम के उपदेश, शिक्षाप्रद मुहावरे, रुचिकर लोकोक्तियां और संतों के मधुर उपदेश बात बात पर दोहराते हैं। लेकिन यदि उनके नित्यप्रति के आचरण को देखने पर वो बिल्कुल विपरीत पाये जाते हैं। ऐसे में धाराप्रवाह शिक्षाप्रद उपदेश का क्या औचित्य है?जब स्वयं का आचरण ही सही नहीं है,तो दूसरों से सही आचरण रखने की आकांक्षा रखने का क्या तात्पर्य है? ध्यान रहे कि ऐसे लोगों के उपदेश का किसी पर कोई अच्छा प्रभाव नहीं पड़ता है। ऐसे व्यक्ति के उपदेश की लोग खिल्ली उड़ाते हैं तथा उसे उपेक्षित करते हैं। अधिकांशतः ऐसे लोगों द्वारा प्रवचन देना अपने निज दुराचरण,चरित्रहीनता और करनी कथनी के भेद को छिपाकर रखना होता है। जनमानस उसकी विद्वत्ता की धाक मानकर उसको सम्मान देता रहेगा। लेकिन ऐसा वास्तव में कुछ घटित नहीं होता है। ऐसे व्यक्ति भी उसी श्रेणी में आते हैं जिस श्रेणी का विवरण ऊपर दिया गया है।
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डॉ. शीलक राम आचार्य
दर्शनशास्त्र- विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
कुरुक्षेत्र136119




