साहित्य

सरसों का साग, मकई की रोटी

कुलदीप सिंह रुहेला

सरसों के साग में बसती है माटी की शान,
मकई की रोटी बोले, गाँव की पहचान।
धूप सर्दियों की आँगन में जब मुस्काए,
चूल्हे की आँच पर साग धीरे-धीरे गुनगुनाए।

माँ के हाथों का स्वाद, दादी की सी कहानी,
हर कौर में मिल जाती है मिट्टी की रवानी।
मक्खन की वो धार जब ऊपर से है बहती,
भूख ही नहीं, आत्मा भी तृप्त होती रहती।

सरसों की खुशबू में खेतों का गीत बसा,
हरी-हरी पत्तियों में किसान का पसीना रसा।
मकई की रोटी, खुरदुरी सी सादी,
पर इसके आगे फीकी हर शहरी आबादी।

लहसुन की छौंक में लय का जादू है,
हर ग्रास में अपनापन, हर कौर में साधु है।
ठिठुरती रातों का ये गर्म-सा उजाला,
साग-रोटी ने ही तो सर्दी को है टाला।

ये भोजन नहीं, ये तो संस्कार है,
देसी थाली में छुपा पूरा संसार है।
जहाँ साथ बैठें सब, कोई ऊँच-नीच नहीं,
सरसों का साग कहे—हम सब एक कहीं।

गुनगुनाती रोटी, साग की तान निराली,
स्वाद नहीं, ये तो है संस्कृति की थाली।
जब भी हो मन उदास, बस इतना ही सोच,
साग-रोटी में बसता है भारत का सुख-रोज़।

कुलदीप सिंह रुहेला
सहारनपुर उत्तर प्रदेश

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