
हे वरदायिनी मां
वीणावादिनी मां
नव नभ में
नव गीत भर दे
नव लय नव स्वर भर दे
हे ज्ञानदायिनी मां

अंधेरा दूर करो मां
प्रकाश पुंज लाओ मां
दिव्य ज्योति से
ज्ञान का कलश भर दो
प्रेमरस जग में भर दो
हे प्रकाशदायिनी मां
तेज धरा पर विखेरो
एक नव सुगंध भर दो
मधुमय सबका जीवन कर दो
हे हंसवाहिनी मां
हे वरदायिनी मां
वीणावादिनी मां
जयचन्द प्रजापति ‘जय’
प्रयागराज
कविता का भावार्थ
……
जयचंद प्रजापति ‘जय’ द्वारा रचित यह सरस्वती वंदना माँ सरस्वती की स्तुति में एक भावपूर्ण भक्ति गीत है, जो ज्ञान, संगीत, प्रकाश और प्रेम की देवी के रूप में उनकी महिमा का गुणगान करती है। कविता की शुरुआत ‘हे वरदायिनी मां, वीणावादिनी मां’ से होती है, जहाँ माँ को वरदान देने वाली और वीणा की ध्वनि से संगीत रचने वाली के रूप में संबोधित किया गया है। ‘नव नभ में नव गीत भर दे, नव लय नव स्वर भर दे’ की पंक्तियों में कवि प्रार्थना करता है कि माँ सरस्वती आकाश को नए गीतों, लयों और स्वरों से भर दें, जो नवीनता और सृजनात्मकता का प्रतीक है। ‘हे ज्ञानदायिनी मां’ से ज्ञान प्रदायिनी स्वरूप की आराधना होती है।
दूसरे अंतरे में ‘अंधेरा दूर करो मां, प्रकाश पुंज लाओ मां’ के माध्यम से अज्ञान के अंधकार को दूर कर दिव्य ज्योति लाने की याचना है, तथा ‘ज्ञान का कलश भर दो, प्रेमरस जग में भर दो’ से दुनिया को ज्ञान और प्रेम से परिपूर्ण करने का आह्वान है, जो ‘हे प्रकाशदायिनी मां’ में प्रकाशकी स्वरूप को रेखांकित करता है।
अंतिम अंतरे में ‘तेज धरा पर विखेरो, एक नव सुगंध भर दो, मधुमय सबका जीवन कर दो’ पंक्तियाँ धरती को तेज, सुगंध और माधुर्य से भरने की कामना व्यक्त करती हैं, जो ‘हे हंसवाहिनी मां’ से हंस पर सवार होने वाली देवी की पारंपरिक छवि को जोड़ती हैं। समापन पंक्तियाँ कविता को पूर्णता प्रदान करती हैं, जो भक्ति, आशावाद और सांस्कृतिक मूल्यों से ओतप्रोत है।




