
जयति जय हे माता शारदे ,
दूर अज्ञान हृदय से कर दे ।
तुम ही माता विद्या दायिनी ,
शुभ-मंगल -सर्वदा दायिनी !
वेद-पुस्तक तुम कर धारिणी ,
दिव्य -सुर -संगीत वीणा वादिनी।
हंस — वाहिनी शुभकारिणी ,
पीत-श्वेत वसन की धारिणी ।
करुणा सागर नाम तुम्हारा,
शब्द ब्रह्म तुम से ही सारा ।
ज्ञान-दीप तुम से उजियारा ,
ऊँकार है मंत्र तुम्हारा ।
विद्या– दात्री माँ वागेश्वरी ,
तुमको नमन हे मातेश्वरी ।
तुम बिन कोई राह न सूझे
मूढ़-अज्ञानी कुछ ना बूझे ।
नवल ज्ञान की जोत जगा दो ,
अंध –तिमिर में दीप जला दो ।
विद्या-बुद्धि का दान करो माँ,
वंदन तुम स्वीकार करो माँ !
मंजुला शरण ‘मनु ‘
राँची , झारखण्ड़ ।




