
पाप बहुत बढ़ गया धरा पर,
मानव कलंक है, मानवता पर,
रस्ते में इसको लाने को,
चोट तो करनी होगी इस पर,
क्रुद्ध रूप अब धरना होगा,
तांडव अब तो करना होगा।
मनुज हो रहा, खुश चोरी में,
गर्वित है, सीना जोरी में,
नारी से खिलवाड़ कर रहा,
काला धन रखता बोरी में,
इसके धन को हरना होगा,
तांडव तो अब करना होगा।
भ्रष्ट, निकम्मा, बेईमानी,
हो गई इसकी यही कहानी,
इसको लाना है रस्ते पर,
मैंने भी अब है यह ठानी,
अब तो इसको डरना होगा,
तांडव तो अब करना होगा।
✍️ नरेश चन्द्र उनियाल,
“कमली कुंज”
देहरादून, उत्तराखण्ड।




