साहित्य

बहुत सर्द है मौसम

सुमन पंत ’सुरभि’

कुछ उनकी भी सुनें
जो बोल नहीं सकते
हम इंसानों की तरह
पर समझते हैं स्नेह औरअपनापन।
जब शीत लहरें साँस बन जाएँ,
और धूप भी रूठ-सी जाए,
तब मौन खड़े हैं वो प्राणी,
जिनकी पीड़ा शब्द न पाए।
नन्हे पंख कोहरे से भारी,
काँपते पाँव, सूनी आँखें,
किससे कहें वे अपनी व्यथा,
कौन सुने उनकी सिसकियाँ।
सड़क किनारे,गलियों के मोड़ पर,
पर्णविहीन पेड़ों की सूनी डाल तले,
रोटी,एक बेआसरा गौवंश, श्वान को
टक-टक देखते हैं हर पल वे।
माँ की गोद नसीब नहीं उन्हें,
न कपड़े, न आग की लौ,
बस इंसानी करुणा से ही
जुड़ सकता है जीवन का छोर।
आओ! अपनी छत, अपना आँगन,
कर दें उनके नाम थोड़ा,
एक कटोरी दाना-पानी,
कोने में पंछियों के लिए
कुछ मूंगफली के दाने
उस प्यारी सी गिलहरी के लिए ।
खाली बोरा या लकड़ी का डिब्बा
सड़क किनारे नन्हें पिल्लों के लिए
बस इतना-सा सहारा।
क्योंकि दया ही असली धर्म है,
और संवेदना सच्चा ज्ञान,
जो बचा सके एक भी जीवन,
वही है मानवता की पहचान।
जब हम उनकी ठंड हर लेते हैं,
तो दिल में उजास उतर आता है।
सर्दी तो मौसम भर रहती है,
पर इंसान भीतर से गरम हो जाता है।
–सुमन पंत ’सुरभि’

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!