साहित्य

तेलुगु भाषी राज्यों का माटी का महाराग:संक्रांति

डॉ.यल.कोमुरा रेड्डी

जब स्वर्ण-शिखा बन धान खड़ा,खेतों में झुक है जाता,
जब कोहरे की चादर ओढ़े, सूरज धीरे है मुस्काता।
तब दक्षिण की गलियों में, एक गूँज मधुर है छा जाती,
तेलुगु की माटी ‘पेद्दा पंडुगा’ का गौरव-गीत है सुनाती।

शुरू हुआ ‘भोगी’ का पर्व, अतीत को भस्म बनाने,
पुरानी जड़ता, द्वेष, कलह को अग्नि में जल जाने।
धधक रहे ‘भोगी मंटलु’, ताप हृदय तक है जाता,
नकारात्मकता जलती है, नव-प्रकाश है मुस्काता।

बच्चों के माथे पर ‘भोगी पल्लु’ का आशीष झरे,
बुरी नज़र से रक्षा हो, घर खुशियों से रहा भरे।
सीढ़ी-दर-सीढ़ी सजीं गुड़ियाँ, ‘बोम्मला कोलुवु’ का श्रृंगार,
लोक-कथाएँ सुना रही हैं, संस्कृति का सार अपार।

चमचमाते द्वारों पर ‘मुग्गु’ की कला है निखरती,
चावल के आटे की रेखा, लक्ष्मी का पथ है रचती।
गोबर की ‘गोब्बेम्मा’ पर, गेंदे का पीला रहे साज़,
कृषि-धरा की उर्वरता का, चहुँओर रहे आगाज़।

‘परमान्नम्’ की सोंधी खुशबू, अंबर तक है लहराती,
ताजे गुड़ की मिठास रिश्तों में, अनुराग है बढ़ाती।
हुए विलीन जो काल-चक्र में, उन पुरखों का है तर्पण,
तिल और कुश की अंजलि से, श्रद्धा का है अर्पण।

आया ‘कनुमा’ साथ लिए, मूक पशुओं का सम्मान,
जिसके कंधों के श्रम पर ही, खड़ा हुआ है यह जहान।
रंगे हुए श्रृंगों के ऊपर, घंटियों की मधुर झंकार,
सजे हुए बैलों की पूजा, किसान का अनुपम प्यार।

कहीं ‘कोडी पंदालु’ का खेल,शौर्य की गाथा गाता है,
कहीं जुए और दाँव-पेच का, हिंसक रंग चढ़ जाता है।
‘मुक्कनुमा’ का अंतिम दिन, रिश्तों का मेला लाया है,
गारेलु और नाटुकोडि ने, दावतों का रंग जमाया है।

हरिदासु के तम्बुरे की, वह तान गली में है गूँजी,
‘अक्षय पात्र’ में अन्न दान ही, भारत की सच्ची है पूँजी।
सजे हुए ‘गंगिरेद्दु’ का, नंदी सा वह है व्यवहार,
मालिक के संकेतों पर, झुक-झुक देता है दुलार।

कहीं तेलंगाना के हाथों से, ‘सकिनालु’ का है घेरा
कहीं आंध्र की ‘अरिसेलु’ में, मिठास का है बसेरा।
हैं राज्य भले ही दो अलग, पर प्राण एक ही है मिट्टी,
संक्रांति की यह गाथा ही, रिश्तों की है लंबी चिट्ठी।

आईटी की उन गलियों से, गाँवों की ओर है पलायन,
भले हुए डिजिटल हम कितने, संस्कृति का यह है परायण।
यह मात्र नहीं फसल कटाई, यह कृतज्ञता का है अर्पण,
मानव, पशु और प्रकृति का, यह सुंदरतम है आकर्षण।

मिट जाए अँधेरा मन का, सूर्य-तेज हो अंतस में,
सदा संक्रांति का यह उत्सव, हर तेलुगु हो मानस में।

डॉ.यल.कोमुरा रेड्डी
सहायक आचार्य एवं अध्यक्ष
हिन्दी विभाग
एस.आर.आर.शासकीय
कला एवं विज्ञान महाविद्यालय,
करीमनगर, तेलंगाना राज्य

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