साहित्य

तुम थी तो ,भाग 2

डॉ रामशंकर चंचल

तुम थी तो
सब कुछ था
नदी थी पहाड़ था
आसमां था पक्षियों का कलवार था
नदी की कल कल थी
जैसे संगीत का अहसास था
पक्षियों का कलवार था
जैसे जीवन में रस था
आसमां में पक्षी की
उड़ान थी जैसे
अपनी सार्थक सृजन और
जीवन की ऊंचाई नाप रहा हूं
सड़क की धड़कन थीं
जैसे उस पर दस्तक दे
चल,दौड़ रहा हूं
कितना कुछ था
इस बेजान प्रकृति में
जो कभी तुम थी तो
सब कुछ समाहित था
इसमें और जीवन
जीवन लगता था
जीवन सार्थक लगता था
जीवन किसी अमानत की तरह
अपना ध्यान रखें
चल रहा था, दौड़ रहा था
जीवन हैं तो
सपने थे , अपने थे
पूरा करने की धुन थीं
लगा हुआ था
रात और दिन का
अहसास था
समय और उसकी कीमत थीं
खुशियों की बरात थीं
कितना कुछ तुम पर
टिका था
कितना क्यों
सब कुछ तो
तुम थी तो था
अब तो लगता ही नहीं
कुछ है
कितना कुछ था तुम मैं
सोच हैरान हूं
आज जब तुम नहीं हो
तब पता चला
तुम, तुम थी
तुम का कोई विकल्प नहीं
होता हैं
तुम का कोई दूसरा
तुम नहीं हो सकता है
तुम ,तुम हो
इसलिए शायद
तुम के साथ
बहुत कुछ
अपनेपन का अहसास है
बहुत कुछ खास हो
का स्वर है, संगीत है
तुम हो बहुत है
जीवन की परिभाषा है
दौड़ है धूप हैं
रौशनी है
क्यों कि तुम हो
जो हर वक्त साथ हो
तुम हो जो सदियों जिंदा रहने के साथ साथ अद्भुत, ऊर्जा ताकत हो
तुम थी तो सब कुछ था
यह आज पता चला
जब तुम छोड़ चली गई
तो कि मैं कुछ नहीं था
तुम से ही
में था
जब तुम ही नहीं तो
कैसा मैं
मैं रहा ही नहीं
तुम उसे भी अपने साथ ले
चली गई और
मुझे खाली कर गई
यही वजह है कि मैं
मैं हूं का अहसास
रही ही नहीं
सब कुछ तुम हो
तुम हो तो
में है
केवल मैं का कहां
अस्तित्व है
तुम थी तो
सब कुछ था
इस परम् सत्य का
अहसास हुआ
डॉ रामशंकर चंचल
झाबुआ मध्य प्रदेश

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