
उनकी बेबसी पर
खिल्ली मत उड़ाना
जो तुम खुद को सभ्य समझते हो
यही तुम्हारी असभ्यता है
मत थूकों उन पर
मत लेना आनन्दरस
उनकी बेबसी को अपमानित कर
उनसे अपनापन दिखाना
गले लगाना
उनकी बेबसी पर ढाल बनना
तभी सभ्य होने का गौरव प्राप्त होगा
अरे पगले!
दो रोटी उनको दे नहीं सकते
उनका निवाला तो मत छीनों
उनको बेबस कर
मत बनाना अपना ताजमहल
……
जयचन्द प्रजापति ‘जय’
प्रयागराज
कविता का भावार्थ..
यह कविता जयचन्द प्रजापति ‘जय’ द्वारा रचित एक मार्मिक सामाजिक व्यंग्य है, जो समाज के सभ्य बनने का दावा करने वालों की पोल खोलती है। कवि उन लोगों पर चोट करते हैं जो गरीबों, असहायों या बेबस वर्ग की मजबूरी पर खिल्ली उड़ाते हैं, उनका अपमान करते हैं और उनकी तकलीफ से आनंद लेते हैं। ‘उनकी बेबसी पर खिल्ली मत उड़ाना’ और ‘मत थूकों उन पर’ जैसे पंक्तियाँ इस क्रूरता को उजागर करती हैं, जहाँ सभ्यता का ढोंग असभ्यता का प्रमाण बन जाता है।
कवि सुझाव देते हैं कि सच्ची सभ्यता तो अपनापन दिखाने में, गले लगाने में और उनकी बेबसी पर ढाल बनने में है—यानी उनकी रक्षा करना। लेकिन व्यंग्यपूर्ण चरम पर आते हुए वे कहते हैं कि कम से कम दो रोटी तो दे नहीं सकते, तो उनका निवाला भी न छीनो।
अंत में ‘उनको बेबस कर मत बनाना अपना ताजमहल’ एक कटाक्ष है, जो गरीबों की लाशों पर खड़े होकर बने वैभवशाली स्मारकों (जैसे ताजमहल का प्रतीकात्मक संदर्भ) की निंदा करता है। कुल मिलाकर, यह कविता असमानता, शोषण और आडंबरपूर्ण सभ्यता पर करारा प्रहार है, जो पाठक को आत्मचिंतन के लिए मजबूर करती है।




