
हसरतें बढ़ती गईं चाहत की छाँव में।
अब भी बचा है प्यार थोड़ा सा गाँव में।।
वो झुरमुटों के झुंड पगडंडियों की राहें –
अब भी कहींकहीं पर दिखती हैं गाँव में।।
शहरों में नीर नाम से बिक रहा है पानी –
मिलता है वही मुफ्त में अब भी गांव में।।
शहरों की शर्त एक यही हम हमीं तो हैं –
रिश्तों की बड़ी कद्र है अब भी गांव में।।
रिश्तों को दफ्न करके शहरों में जो बसे –
उनके लिए दुआएं भी होती हैं गाँव में।।
– डॉ.उदयराज मिश्र




