साहित्य

वै. वि. व कर्म- 4

चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा "अकिंचन"

धर्म के लक्षण दस बतलाते धृति, क्षमा, दम,अस्तेय, शौच।
इन्द्रियनिग्रह,धी,विद्या,सत्य,अक्रोध का पालन सब निःसंकोच।।
धर्म कराता श्रेयस सिद्धिःव धर्म मार्ग से है लोक में उद्भव।
“जहाँ धर्म है वहीं विजय है”, धर्मशील से मोक्ष है सम्भव।।
जीवन शैली है,धर्म का पालन,धर्म नहीं है मत व मतान्तर।
आचरणीय है मानव हित में इसे बसा लें, उर- अभ्यन्तर।।
निष्कामकर्म कर मोक्ष पद पाना,काम्यकर्म कर प्रारब्ध बनाना।
अहेतुकर्म है,संध्यावन्दन करना,हेतुककर्म सोलहसंस्कार रचाना।।
विहितकर्म,नित्यकर्म का करना,प्रतिषिद्धकर्म जो त्याज्य नकरना।
धर्म,अर्थ,काम,मोक्ष अनुपालन है, धर्म कर्म से भवसागर तरना।।
शर्मा, वर्मा, गुप्त, दास वर्ण हैं, ये कर्म परक, शुचि और कुलीन।
जन्मना जातिसिद्धांत,अवैदिक है,वैद्वेषिक,जर्जरितऔर मलीन।।
एक विधाता के हैं सब सम संतान,धमनी में है सबके रक्त समान।
छूत अछूत का भेद रचाकर,क्यों करते हो तुम इनका अपमान।।
वशिष्ठ, व्यास, विदुर,पाराशर, वाल्मीकि वंशज हैं नहीं अकर्मा।
‘प्रज्ञा को नमस्कार’ कहो मत,हैं विश्वकर्मा के सब पुत्र सुकर्मा।।
एक जाति है सब मनुजों का, हैं मनु के पुत्र सभी मनु-वंशी।
जो संस्कार तज शूद्र हैं बनते, आर्य बन्धु हैं ये सभी अनुवंशी।।
पंथ बताते हैं आराध्य को पाना,है धर्म स्वयं ही विहित लक्ष्य।
अनुवर्तन है,जिसका ईश विधान, है धर्मआचरण कर्म सुदक्ष्य।।
क्रमशः -5/ ✍️चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा “अकिंचन”

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