
श्वेत कमल पर विराजित माँ,
हंस संग करतीं पथ-प्रदर्शन।
शुभ्र वसन में ज्योति स्वरूपा,
ज्ञान-सुधा का करतीं सिंचन।
वीणा की मधुर तान से,
निश्छल मन में दीप जगाएँ।
अज्ञान-तम का नाश करें माँ,
बुद्धि-विवेक का बीज उगाएँ।
मस्तक पर चंद्र-सी शीतलता,
नेत्रों में करुणा अपार।
वाणी में बहती सरिता-सी,
सत्य-सौंदर्य का मधुर सार।
हस्तों में ग्रंथ, वीणा, माला,
कला-साधना का शुभ संकेत।
शब्द-सुर-लय का संगम बनकर,
जीवन को देतीं नव-प्रेरित।
हे माँ वीणावादिनी,
हम पर कृपा दृष्टि बरसाना।
कलम, कंठ और कर्म हमारे,
तेरे चरणों में अर्पित करना।
जय सरस्वती माता।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा
मुजफ्फरपुर, बिहार




