
हीरा की खान से निकला, नाम पड़ा विवेकानंद
पिता थे विश्वनाथ, पाश्चात्य संस्कृति को मानते,,
अतिथि सेवा का भाव उनका, खुद भूखे रह जाते,
पर अतिथि को कष्ट न देते, समाज सेवा में रहते।
एक दिन घर छोड़कर जब वो आयेवै वैलूरमठ,
साक्षात्कार हुआ तब गुरु से स्वयं आत्मज्ञान हुआ।
जब लिया सन्यास तब नाम मिला विवेकानंद,
विश्व में नाम कमाया जिसने मिला आकाश।
उठो जागो रूको नहीं लक्ष्य प्राप्त करो!
स्वतंत्र होने का साहस करो, अपने विचार मन में भरो।
तब तक मत रूको जब तक उसे पा न लो ! !
अपने विचार का सत्य साकार करो !
डॉ उषा जलकिरण
छतरपुर मध्यप्रदेश




