साहित्य

यादों का शहर

सुमन बिष्ट

 

मुद्दतों बाद दिल को सुकून का बहाना मिला था,
वीरान सी धड़कनों को कोई एक नाम मिला था।

खामोश रातों में दिल कुछ ज़्यादा ही अकेला था,
आईने में भी एक चेहरा अजनबी सा देखा था।

कोई आया तो लगा दिल को ठिकाना मिला था,
जैसे बरसों की तन्हाई को इक बहाना मिला था।

क़िस्मत की अजब सी लिखावट का ही करिश्मा था,
एक ही मोड़ पर सब कुछ टूटकर बिखरा हुआ था।

कभी बारिश की तरह वो प्यार बेइंतहा बरसा था,
मेरी सूखी हुई मिट्टी का तन अंतर्मन महका था।

बातों में न कोई अर्थ था, न कोई सही बहाना था,
समझने समझाने का हुनर शायद हमने नहीं जाना था।

न मैं समझ सकी उसको, न वो समझा मुझे शायद ,
हर लफ़्ज़ के बीच सन्नाटों का सैलाब था शायद।

हमज़ुबां होकर भी न जाने कैसे दूरी का सबब बन गया,
पास रहकर भी हर एहसास अधूरा सा रह गया।

बदलते वक़्त की अपनी ही कुछ मजबूरियां रही होंगी
न जाने गुज़रते पल में हर रिश्ता छूटता जा रहा था।

रुकने की तमन्ना में भी वक़्त किसी का कहाँ रुका था,
मगर एक पल को सब कुछ
रुक कहीं थम सा गया था।

जो मिला था वो शायद एक इत्तेफ़ाक़ भर था,
उसे पाकर भी हमेशा उसको
खोने का डर था।

अब यादों के शहर में उसका वही चेहरा रहता था,
हर बीता हुआ लम्हा मुझसे बहुत कुछ कहता था।

इश्क़ में हारकर भी उम्मीद का दिया जलता था,
लेकिन टूटकर भी हौसला चुपचाप संभलता था।

कुछ मुलाक़ातों का अधूरापन ही मुझे हासिल था,
मुकम्मल न होना ही शायद किस्मत का फ़ासिल था।

सुमन बिष्ट, नोएडा

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