
युवा सदा लगा रहा,
डटा रहा सुकाज में।
जला स्वयं प्रखंड वो,
मिला तभी सुराज है।।
निशा जहाँ जला सदा,
तभी हुआ उजास है।
स्वभाव स्वर्ण ज्योति का,
मिटा रहा अँधेर है।।
सुहाग माँग में सजा,
नया विहान हो गया।
खिली-खिली धरा सजी,
हमें खुशी मिली यहाँ।।
सुगंध पुष्प की यहाँ,
मिली नहीं उसे कभीं।
दिया सदा लिया नहीं,
विदा हुआ चला गया।।
डॉ अनुराधा प्रियदर्शिनी
मथुरा, उत्तर प्रदेश




