आलेख

आधुनिक विकास में ‘नैतिकता’ का पतन

डॉ शीलक राम आचार्य

आज संसार में अस्तित्व के संबंध में जानकारी प्राप्त करने के लिये जो विचारधाराएं मौजूद हैं, उनमें पहली यह मानती है कि ‘चेतन’ से ‘जड़’ की उत्पत्ति होती है। इसके अंतर्गत भारत में वेद, ब्राह्मण,आरण्यक,उपनिषद्, योग वाशिष्ठ,अष्टावक्र, शंकराचार्य आदि मौजूद रहे हैं। पश्चात् जगत् में इस सिद्धांत को मानने वालों में पारमेनाईडिज,हीगल, ब्रैडले,ग्रीन आदि आते हैं। इन्होंने एक सत् तत्व को ही मुख्य माना है।
दूसरी विचारधारा को मानने वाले ‘जड’ से ‘चेतन’ की उत्पत्ति मानते हैं।भारत में इस संबंध में वेदों से लेकर आज तक अनेक सूचनाएं मौजूद हैं। वेद, ब्राह्मण, आरण्यक,उपनिषद् आदि में पूर्व पक्ष के रूप में इसके छूटपुट संदर्भ मिल जाते हैं। इसके अतिरिक्त पुरोचन,बृहस्पति,चार्वाक,आजीवक आदि इस विचारधारा के कट्टर समर्थक मौजूद रहे हैं। पाश्चात्य जगत् में इस सिद्धांत को मानने वालों में थैलिज,ईपिकुरियस, डैमोक्रिटस,हाब्स,पोलबाक फ्यूहरबाक,मार्क्स एंजेल्स तथा अधिकांश भौतिकवादी वैज्ञानिक आदि आते हैं।
तीसरी विचारधारा उन विचारकों की है जो तीन मौलिक तत्वों ईश्वर,आत्मा और प्रकृति को मानते हैं। इनके अनुसार कोई तत्व किसी से उत्पन्न नहीं होता है।सब खेल तीन तत्वों का है। सनातन धर्म और संस्कृति में इस सिद्धांत को मानने वालों में अधिकतर भारतीय विचारक और ग्रंथ आते हैं।वेद, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद्, दर्शनशास्त्र, स्मृति,पुराण, महाकाव्य आदि में इसी विचारधारा को मुख्यतः स्वीकार किया गया है। आधुनिक युग में इस विचारधारा के प्रबल पोषक महर्षि दयानंद सरस्वती रहे हैं।यह विचारधारा सर्वाधिक सटीक, उचित और संतोषजनक है।इस विचारधारा के अनुसार दर्शनशास्त्र,फिलासफी, धर्म और विज्ञान की अधिकांश समस्याओं का समाधान हो जाता है।
यहां पर यह ध्यातव्य है कि भारतीयों ने अपने सनातन धर्म,संस्कृति, दर्शनशास्त्र , जीवनमूल्यों और महापुरुषों के विरोध में अपने विरोधियों से बहुत कुछ सुना हुआ है लेकिन विडंबना है कि स्वयं भारतीय अपने धर्म, संस्कृति, दर्शनशास्त्र , जीवनमूल्यों और दर्शनशास्त्र के संबंध में बहुत कम पढ़े -लिखे होते हैं। अधिकांश सनातनधर्मी लोग अपने धर्म,संस्कृति, दर्शनशास्त्र, जीवनमूल्यों और महापुरुषों के संबंध के संबंध में विदेशी हमलावर विचारकों, लेखकों और फिलासफर से जानकारी हासिल किये हुये होते हैं।दो दशक पहले यह जानकारी भारतीय शिक्षा संस्थानों में मौजूद मैकाले,मैक्समूलर,मोनियर विलियम और जेम्स मिल द्वारा समर्थित शिक्षा पद्धति से मिलती थी।अब दस पंद्रह वर्ष से यह जानकारी सोशल मीडिया से मिल रही है। सोशल मीडिया के सभी समूहों पर अब्राहमिक कल्चर का कब्जा है।वो जैसी कपोल-कल्पित और मनघड़ंत जानकारी हमें देना चाहते हैं, उसे धड़ल्ले से दे रहे हैं। हमारे शिक्षा संस्थानों में पिछले सात दशकों से यही चल रहा है।इस पर कोई रोक-टोक नहीं है। स्नातकोत्तर स्तर के विद्यार्थियों को भारतीय सनातन धर्म, संस्कृति, दर्शनशास्त्र, योग, अध्यात्म, समाज-सुधार, नैतिकता, पुरातन ग्रंथों और महापुरुषों के संबंध में प्रामाणिक जानकारी देने में कितनी कठिनाईयां आती हैं,इसे मैं स्वयं पिछले बीस वर्षों के विश्वविद्यालयीन शैक्षणिक अनुभव से महसूस करता आया हूं।जो भी विद्यार्थी योग डिप्लोमा, काउंसलिंग डिप्लोमा, श्रीमद्भगवद्गीता डिप्लोमा और विश्वविद्यालय की स्नातकोत्तर कक्षाओं में प्रवेश लेते हैं,वो अधिकांशतः पाश्चात्य पद्धति की सनातन भारतीय विरोधी शिक्षा पद्धति से पूरी तरह रंगे हुये होते हैं।उनका पूरी तरह से माईंड वाश हो चुका होता है। उन्हें सत्य जानकारी देना टेढी खीर होती है। कक्षाओं में जब हमारे विद्यार्थी कुछ भी बोलते हैं, जिज्ञासा करते हैं या शंका समाधान करते हैं तो उनमें से मैकाले, मैक्समूलर, मोनियर विलियम, जेम्स मिल, मार्क्स आदि अब्राहमिक कल्चर के विचारक बोल रहे होते हैं।
यहां पर यह जान लेना भी दिलचस्प है कि शुरू शुरू में अधिकांश पाश्चात्य विचारक यह मानते थे कि वेदों में अनेकेश्वरवाद या हीन अनेकेश्वरवाद मौजूद है तथा वहां पर शुद्ध एकेश्वरवाद उपलब्ध नहीं होता है। वास्तव में यह धारणा पूरी तरह से मिथ्या है।आर्यसमाजी विचारकों ने इस प्रकार की विचारधारा का पुरजोर खंडन करके वैदिक साहित्य से शुद्ध एकेश्वरवाद की पुष्टि की है तथा पाश्चात्य विचारकों द्वारा फैलाये भ्रम के बादलों को छिन्न-भिन्न किया है।
तीन अब्राहमिक मजहबों में एकेश्वरवाद की अवधारणा को आधे- अधूरे ढंग से पारसी मजहब और शंकराचार्य के अद्वैतवादी दर्शनशास्त्र से लिया गया है। ‘ब्रह्म सत्य जगत् मिथ्या’ शंकराचार्य की अवधारणा है। जरथुष्ट्र द्वारा प्रेरित ‘पारसी मजहब’ और उनकी पवित्र पुस्तक ‘जेंद अवेस्ता’ टूटी- फूटी वेदों की नकलमात्र है।
भारतीय गांव देहात में एक कहावत है कि आप भैंस को तालाब पर लेकर जा सकते हैं लेकिन उसको जबरदस्ती करके पानी नहीं पिला सकते।जब उसको प्यास लगेगी,तभी वह पानी पीयेगी। दर्शनशास्त्र विषय के संबंध में में यह बात पूरी तरह से सच है।आप किसी व्यक्ति को दर्शनशास्त्र विषय पढा सकते हो, लेकिन अपने प्रयास से उसको जबरदस्ती करके दर्शनशास्त्री नहीं बना सकते। भारतीय विश्वविद्यालयों में तो हालात इससे भी अधिक बदतर हो चुके हैं। यहां पर तो सही तरीके से दर्शनशास्त्र विषय को पढ़ाने वाले शिक्षकों का ही अकाल पड़ा हुआ है।बस, अधिकांश अपना समय व्यतीत कर रहे हैं।हर महीने मोटी तनख्वाह मिल जाती है।यह मोटी तनख्वाह अच्छी तरह पढ़ायेंगे तो भी मिलेगी तथा नहीं पढ़ायेंगे तो भी मिलेगी। हमारे वाले शिक्षक नहीं पढ़ाने वाले आप्शन का चयन करते हैं।
सत्ता कभी भी विनम्र नहीं होती है। जनमानस के प्रति सत्ता सदैव से क्रूर रहती आई है। सत्ता का चाहे कोई भी स्वरुप हो, इससे फर्क नहीं पड़ता है। साम्यवादी, समाजवादी, पूंजीवादी या फिर लोकतांत्रिक – हर प्रकार की सत्ता क्रूर होती है। सत्ता जनमानस से भयभीत हो जाये, इससे पहले ही जनता जनार्दन को भयभीत करने के जुगाड कर लिये जाते हैं। सत्ता के पास फौज, पुलिस,पूंजी और मीडिया की ताकत होती है। बेशक जनता -जनार्दन अपने जमीनी मुद्दे उठाने का प्रयास करे, सत्ता उपरोक्त चारों शक्तियों के बल से उसे दबाकर रखती है। क्योंकि सत्ता को जनता जनार्दन की समस्यायों से अधिक अपनी सत्ता को बनाये रखने की अधिक चिंता होती है।सच को झूठ और झूठ को सच बनाने के सारे हथियार सत्ता के पास मौजूद होते हैं।कितनी भी जनविरोधी सत्ता हो,वह जनता के बीच से ही अपने समर्थन में जय जयकार करने वाला वर्ग तैयार कर ही लेती है।वह वर्ग भूखा-प्यासा रहकर भी जनविरोधी सत्ता के लिये सुरक्षा कवच का काम करता है।इस वर्ग को अंधभक्त वर्ग कहा जाता है। प्रचंड मूर्ख यह अंधभक्त वर्ग अपना और अपने राष्ट्र का नुकसान करके भी क्रूर सत्ता के साथ रहता है।यवन, मंगोल,मुगल, पुर्तगाली, अफगान और अंग्रेज आक्रमणकारियों के समय भी भारत में ऐसा अंधभक्त वर्ग मौजूद था।वह आंखों को बंद करके आततायी विदेशी आक्रमणकारियों के साथ खड़ा रहता था।इस तरह की गद्दारी करने वाला वर्ग लूटपाट में थोड़ा हिस्सा पाकर खुश हो जाता था।
संसार में किसी भी क्षेत्र में सफल और असफल होने वाले लोगों की लिस्ट बनाई जाये तो बहुमत उन लोगों का मिलेगा कि जिन्होंने चापलूसी, धोखाधड़ी,झूठ और तिकड़मबाजी के सहयोग पर सफलता पाई है। और उन लोगों की संख्या बहुत कम मिलेगी कि जिन्होंने सत्यनिष्ठा, पुरुषार्थ, मेहनत और प्रतिभा के बल पर सफलता पाई है। संसार के विभिन्न देशों में जो राजनीतिक , प्रशासनिक, आर्थिक और प्रबंधकीय सिस्टम फिलहाल चल रहा है, उसमें अच्छे लोगों की उपेक्षा और बुरे लोगों को पुरस्कृत किया जाता है।यह किसी एक क्षेत्र की नहीं अपितु हरेक क्षेत्र की सच्चाई है। केवलमात्र दिखावे के लिये ही प्रिंट मीडिया, इलैक्ट्रोनिक मीडिया और सोशल मीडिया पर अच्छाई की विजय और बुराई की पराजय की कहानियां सुनाई जाती हैं। हकीकत में ऐसा कहीं भी और कभी भी नहीं होता है।इस प्रकार का दुष्प्रचार नेताओं, धर्मगुरुओं और पूंजीपतियों द्वारा इसलिये किया जाता है ताकि जनता- जनार्दन को बेवकूफ बनाया जा सके तथा उपरोक्त तथाकथित बड़े लोगों का लूटपाट का धंधा बिना किसी रुकावट के चलता रहे। समस्त धरा पर यही हो रहा है। क्या विनाशकारी युद्धक हथियार बनाने वाली बडी -बडी कंपनियों के खरबपति स्वामी सत्यनिष्ठ हैं? क्या कार,ट्रक,बस,बाईक, कंप्यूटर, लैपटॉप, मोबाइल आदि बनाने वाली कंपनियों के खरबपति स्वामी वास्तव मेहनतकश हैं?क्या एलोपैथिक दवाओं को बनाने वाली कंपनियों के खरबपति स्वामी करुणावान हैं?क्या कोयला खदान, मकान निर्माण सामग्री निर्माता माइनिंग करने वाले तथा सड़क बनाने वाले खरबपति लोग ईमानदार हैं? क्या खेती-बाड़ी के लिये शंकर बीज बनाने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों के खरबपति स्वामी प्रेम से भरे हुये हैं?क्या प्रतिदिन लाखों पशुओं का क़त्ल करने वाले कत्लखानों के खरबपति स्वामी न्यायकारी हैं?क्या शिक्षा को व्यापार बनाकर खरबों रुपए लूटने वाले निजी शिक्षण संस्थाओं के स्वामी,शिक्षक, प्रोफेसर आदि प्रतिभाशाली हैं? क्या विभिन्न देशों के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, प्रशासनिक अधिकारी और पुलिस अधिकारी दूध के धुले हुये हैं?उपरोक्त सभी लोगों में ऐसे कौनसे गुण, योग्यता और प्रतिभा के चमत्कार मौजूद हैं, जोकि वास्तविक सत्यनिष्ठ, कर्तव्यनिष्ठ, करुणामय, बुद्धिमान, मेहनतकश और ईमानदार लोगों में नहीं हैं? यदि निष्पक्षता से निर्णय लिया जाये तो मालूम होगा कि संसार में किसी भी क्षेत्र में सफल लोगों का प्रतिशत लूटेरे,बेईमान,भ्रष्ट,चोर,हिंसक, तिकड़मबाज और चापलूस लोगों का अधिक है।
ऐसे लूटपाट के परिवेश में कोई कुछ भी कहता रहे, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है।श्रीमद्भगवद्गीता 12/12 में भगवान् श्रीकृष्ण ने जो कहा है कि ‘अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है। ज्ञान से ध्यान श्रेष्ठ है। ध्यान से कर्मफलत्याग श्रेष्ठ है। कर्मफलत्याग से ही शांति की अनुभूति होती है’- इस प्रकार के उपदेशों का कोई भी महत्व नहीं है। टेढी उंगली किये बगैर बर्तन से घी नहीं निकल सकता है। हां, यदि उंगली को टेढ़ा कर लिया जाये तो पूरा बर्तन घी से खाली किया जा सकता है।कुछ गिने-चुने दस प्रतिशत चालाक, धूर्त, लूटेरे, चापलूस, तिकड़मबाज, भ्रष्ट और हिंसक लोग उंगलियां टेढ़ी कर करके दुनिया की अधिकांश सुख सुविधाओं पर कब्जा किये बैठे हैं।
विष्णु शर्मा द्वारा लिखित ‘हितोपदेश’ नामक नीति ग्रंथ के ‘मित्र लाभ’ प्रकरण में कहा गया है –

विद्या विवादाय धनं मदाय खलस्य शक्तिः परपीडनाय।
साधोस्तु सर्वं विपरीतमेतद् ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय॥

इसका अर्थ है कि दुष्ट की विद्या विवाद के लिए, धन अहंकार के लिए और शक्ति दूसरों को कष्ट देने के लिए होती है, इसके विपरीत सज्जनों की विद्या ज्ञान के लिए, धन दान के लिए और शक्ति दूसरों की रक्षा के लिये होती है।भारत पर अकारण हमले करने वाली विदेशी शक्तियों और विदेशी शासकों साईरस,डेरियस, सिकंदर,मंगोल,हूण,डच, डैनिश, पुर्तगाली और अंग्रेजों ने आखिर ऐसा क्यों किया था?इन आक्रमणों के पीछे उनकी कौनसी मानसिकता थी? शताब्दियों तक धर्माचार्यों और सैनिकों की सेना लेकर भारत पर आक्रमण करने के पीछे उनकी कौनसी कामना थी,जो पूरी हो जाती?अकारण किसी संप्रभु राष्ट्र पर आक्रमण करके उसके धन -दौलत, संपदा,वैभव, शिक्षा, नैतिक -मूल्यों सभ्यता, संस्कृति और धर्म को बर्बाद करना कौनसा कल्याणकारी कृत्य है?यह एक आसुरी और राक्षसी कृत्य है।
…….
डॉ शीलक राम आचार्य
दर्शनशास्त्र -विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
कुरुक्षेत्र -136119

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Check Also
Close
Back to top button
error: Content is protected !!