
आधुनिक सामाजिक विमर्श में अधिकारों की चर्चा जितनी मुखर है, उतनी ही मौन अनुशासन और कर्तव्य की बात हो गई है। व्यक्ति स्वयं को अधिकारों का स्वाभाविक अधिकारी मानता है, पर उनके अनुरूप आचरण और संयम को स्वीकार करने में संकोच करता है। यही असंतुलन आज सामाजिक जीवन की जड़ों को कमजोर कर रहा है।
अधिकार मूलतः संरक्षण के साधन हैं, परंतु जब वे अनुशासन से अलग हो जाते हैं, तब वे टकराव का कारण बनते हैं। सनातन चिंतन में अधिकार और कर्तव्य को एक ही सिक्के के दो पक्ष माना गया है। जहाँ कर्तव्य निभाया जाता है, वहीं अधिकार स्वतः सुरक्षित रहते हैं। अधिकारों की निरंकुश माँग और कर्तव्यों से विमुखता सामाजिक विवेक को क्षीण कर देती है।
वर्तमान समय में यह प्रवृत्ति स्पष्ट दिखाई देती है कि व्यक्ति अपनी असुविधा को अन्याय और अपनी इच्छा को अधिकार का रूप दे देता है। सामाजिक अनुशासन को वह बाधा मानने लगता है। परिणामस्वरूप सार्वजनिक जीवन में मर्यादा का ह्रास होता है और व्यवस्था के प्रति सम्मान समाप्त होने लगता है। जब नियम केवल दूसरों के लिए होते हैं और स्वयं के लिए अपवाद बन जाते हैं, तब समाज में असंतुलन अपरिहार्य हो जाता है।
परिवार, शिक्षा और संस्थायें इस स्थिति से सबसे अधिक प्रभावित हैं। परिवार में अधिकारों की अपेक्षा बढ़ रही है, पर दायित्वों की भावना कम होती जा रही है। शिक्षा में अनुशासन को दमन समझा जाने लगा है, जबकि वास्तव में वही व्यक्तित्व निर्माण का आधार है। संस्थाओं में नियमों का पालन भय से होता है, विवेक से नहीं। यह स्थिति स्थायित्व नहीं, केवल अस्थायी नियंत्रण प्रदान कर सकती है।
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी अनुशासनविहीन अधिकार व्यक्ति को आंतरिक संघर्ष की ओर ले जाते हैं। सीमाओं के अभाव में व्यक्ति निर्णय नहीं कर पाता कि कहाँ रुकना है। उसे स्वतंत्रता तो मिलती है, पर संतोष नहीं। यही असंतोष आगे चलकर आक्रोश, विद्रोह और सामाजिक कटाव का रूप ले लेता है।
सामाजिक संतुलन के लिये यह आवश्यक है कि अधिकारों को अनुशासन की भूमि पर स्थापित किया जाए। अनुशासन कोई बाहरी थोपाव नहीं, बल्कि आंतरिक स्वीकार है कि मेरी स्वतंत्रता दूसरों की व्यवस्था से जुड़ी हुई है। जब व्यक्ति यह समझ लेता है, तब अधिकार टकराव नहीं, सहयोग का माध्यम बन जाते हैं।
समाज तभी स्थिर रह सकता है, जब अधिकारों की रक्षा अनुशासन द्वारा और अनुशासन का पालन विवेक द्वारा किया जाये। अधिकार यदि केवल माँग बन जायें और अनुशासन केवल दंड का साधन, तो सामाजिक ढाँचा भीतर से खोखला हो जाता है। इस संतुलन की पुनर्स्थापना ही वर्तमान सामाजिक संकट का सार्थक समाधान है।
ज्योतिषाचार्य अरुण कुमार मिश्र
सनातन धर्म तथा संस्कृति के “प्रेरक-वक्ता” व
राष्ट्रीय अध्यक्ष:- माँ शारदा वेलफेयर सोसाइटी
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क्रमशः



