
भारतीय लोकतंत्र की यात्रा में नीतियाँ कागज़ पर नहीं बल्कि जनमानस में चलती हैं।जनमानस की आकांक्षा,प्रत्याशा और भावनाओं के अनुरूप ही लोकमंगल तथा जनकल्याण के मसले संसद में गहन परिचर्चा के उपरांत संस्थागत नीतियों के अंग बनते हैं,किंतु जब सत्ताधारी दलों को केवल अपनी सत्ता की निरंतरता ही सर्वाधिक प्रिय लगे तो वह ऐसे फैसले लेने में गुरेज नहीं करती जो सामाजिक विद्वेष और जनभावनाओं के द्वंद के कारण बनते हैं तथा परिणाम अन्त में नकारात्मक ही होता है।कदाचित 2004 के आम चुनाव में अटल जी के नेतृत्व में “फील गुड” और “इंडिया शाइनिंग” का अभियान विकास, अवसंरचना और वैश्विक प्रतिष्ठा की उपलब्धियों पर आधारित था। आर्थिक संकेतक सकारात्मक थे, परंतु परिणामों ने यह सिखाया कि विकास की अनुभूति यदि व्यापक सामाजिक वर्गों तक समान रूप से नहीं पहुँचती, तो राजनीतिक आत्मविश्वास भी पराजय में बदल सकता है।कुछ ऐसा ही परिदृश्य यूजीसी के इक्विटी बिल को लेकर भी इस दफा नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ बनता जा रहा है।हालांकि अबकीबार यह नजरिया भाजपा के चिरस्थाई वोटबैंक की नाराजगी को लेकर है।
दिलचस्प बात है कि आज मोदी के नेतृत्व में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में “इक्विटी” आधारित सुधारों की चर्चा है। उद्देश्य सामाजिक संतुलन और ऐतिहासिक वंचनाओं की भरपाई बताया जाता है। किंतु प्रश्न यह है कि कहीं नीति की मंशा और जनता की धारणा के बीच वही अंतर तो नहीं बन रहा, जो कभी “फील गुड” के समय दिखा था?कहीं शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान की पीठ पर बंदूक रखकर कोई और तो सवर्णों पर फायर नहीं कर रहा है या कि स्वयं भाजपा अब अपने परम्परागत समर्थक सामान्यवर्ग से पिंड छुड़ाकर ओबीसी,दलितों और मुसलमानों की राजनीति करने की हमराह होना चाहती है?जो भी हो,भाजपा की स्थिति अब सांप और छँछूदर जैसी है।
इक्विटी बनाम मेरिट की बहस वर्तमान संदर्भ में प्रासंगिक तो है किंतु सामान्यवर्ग को अकारण अपराधी बनाकर ही यह किया जाय,ऐसा अनुचित निर्णय कभी स्वीकार नहीं हो सकता है।उच्च शिक्षा में अवसरों का न्यायपूर्ण वितरण लोकतांत्रिक आदर्श है। किंतु जब “इक्विटी” की अवधारणा को इस प्रकार प्रस्तुत किया जाता है कि सामान्य वर्ग के युवाओं को अवसर-संकुचन का भय होने लगे पढ़ाई आदि में पिछड़ने पर या द्वेषवश ओबीसी तथा दलित या मुस्लिम छात्रों द्वारा सामान्यवर्ग के विद्यार्थियों को आरोपित करने की गलत परम्परा ही शुरू हो तो सामाजिक तनाव जन्म ले सकता है।इस लिहाज से बिल को लेकर सामान्यवर्ग की नाराजगी वाजिब है।सामान्य वर्ग को प्रायः एक समृद्ध और सशक्त समूह के रूप में चित्रित किया जाता है, जबकि यथार्थ अधिक जटिल है। ग्रामीण भारत और छोटे नगरों में अनेक ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा अन्य सामान्य वर्गीय परिवार आर्थिक रूप से अत्यंत विपन्न हैं—भूमिहीन, सीमित आय वाले, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के संसाधनों से वंचित।
आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग की व्यवस्था एक सकारात्मक पहल है, परंतु उसका दायरा और प्रभाव अभी भी बहस का विषय है। यदि अति गरीब सामान्य वर्गीय युवाओं को यह लगे कि उनकी गरीबी केवल इसलिए कम महत्वपूर्ण है क्योंकि वे “सामान्य वर्ग” से हैं, तो यह अनुभूति राजनीतिक असंतोष में बदल सकती है।
उपेक्षा की भावना और संभावित चुनावी प्रभाव सदैव आकांक्षी राजनैतिक दलों पर भारी पड़े हैं।2004 का अनुभव बताता है कि उपलब्धियों का आकलन जनता अपने अनुभवों के आधार पर करती है। यदि किसी वर्ग में यह धारणा बने कि उसकी आकांक्षाएँ गौण हो रही हैं, तो उसका असर चुनावों में दिख सकता है।भाजपा के लिए ऐसी स्थितियां कभी भी सुखप्रद नहीं रही हैं।
शिक्षित मध्यमवर्ग जो नीति और विमर्श को दिशा देता है—यदि स्वयं को उपेक्षित अनुभव करे, तो वह राजनीतिक विमर्श को प्रभावित करता है। सोशल मीडिया के युग में यह प्रभाव और तीव्र हो जाता है।
भाजपा सरकार मुफ्तखोरी की प्रवृत्ति को बढ़ाकर भले ही इसे कल्याण बनाम निर्भरता कहे किंतु सत्य तो यही है कि यह राजनैतिक उद्देश्यों की पूर्ति का साधन है।पिछले वर्षों में केंद्र और राज्यों द्वारा मुफ्त राशन, बिजली, छात्रवृत्तियाँ, नकद हस्तांतरण जैसी योजनाओं का विस्तार हुआ है। कल्याणकारी राज्य की अवधारणा आवश्यक है, परंतु यदि राजनीति “प्रतिस्पर्धी मुफ्तखोरी” का रूप ले ले, तो यह नागरिकों में निर्भरता की मानसिकता को जन्म दे सकती है। यदि अधिकार का बोध परिश्रम और योग्यता से हटकर केवल राजनीतिक समीकरण से जुड़ जाए, तो उत्पादकता और आत्मनिर्भरता दोनों प्रभावित होते हैं। शिक्षा क्षेत्र में भी यदि इक्विटी की बहस को मेरिट के प्रतिपक्ष के रूप में प्रस्तुत किया गया, तो यह विभाजन को गहरा कर सकता है।
विचारणीय तथ्य तो यह भी है कि हाल के वर्षों में कुछ राजनीतिक वक्तव्यों और वैचारिक मंचों पर ऐसी भाषा उभरी है जो ऐतिहासिक अन्याय के संदर्भ में वर्तमान पीढ़ियों को सामूहिक रूप से दोषी ठहराती है। चाहे वह कुछ ओबीसी नेताओं का आक्रामक वक्तव्य हो या कुछ दलित विचारकों की तीखी अभिव्यक्ति—यदि वह संपूर्ण किसी जाति-समूह के प्रति द्वेष का रूप ले ले, तो इसके दुष्परिणाम गंभीर हो सकते हैं।जिसके
संभावित परिणामों में सामाजिक ध्रुवीकरण और पारस्परिक अविश्वास,प्रतिक्रिया-आधारित राजनीति का उभार,विश्वविद्यालयों और सार्वजनिक विमर्श में कटुता,राष्ट्रीय एकता पर आघात आदि।यही इतिहास की पीड़ा वास्तविक है, परंतु उसका समाधान वर्तमान पीढ़ियों के बीच वैमनस्य बढ़ाकर नहीं किया जा सकता। संविधान का मार्ग—न्याय, समानता और बंधुता—प्रतिशोध नहीं, संतुलन की शिक्षा देता है।
अतः समस्या के समाधान जाति की जगह आर्थिक आधार को प्राथमिकता देते हुए प्रत्येक अति गरीब चाहे किसी भी जाति के हों, उन्हें लक्षित सहायता मिले।
अवसरों का विस्तार हो तथा उच्च शिक्षा संस्थानों और सीटों की संख्या बढ़ाकर प्रतिस्पर्धा का दायरा विस्तृत किया जाए।डेटा-आधारित पारदर्शिता करते हुए नीतियों के प्रभाव का स्पष्ट आकलन सार्वजनिक किया जाए तथा नेताओं और विचारकों को ऐसी भाषा से बचना चाहिए जो विभाजन को बढ़ाए।इसके अलावा कल्याण से कौशल की ओर – मुफ्त योजनाओं के साथ कौशल-विकास और उद्यमिता को जोड़ा जाए।
अटल युग का “फील गुड” यह सिखाता है कि विकास का दावा तभी टिकाऊ होता है जब उसकी अनुभूति व्यापक और संतुलित हो। आज “इक्विटी” का विमर्श भी तभी सफल होगा जब वह किसी नए वर्ग में उपेक्षा और आक्रोश की भावना उत्पन्न न करे।लोकतंत्र में स्थायी सफलता वही पाता है, जो समाज के हर वर्ग—ऐतिहासिक रूप से वंचित और वर्तमान में वंचित—दोनों को सम्मान, अवसर और विश्वास प्रदान करे।
विकास और सामाजिक न्याय का समन्वय ही वह सेतु है, जो अतीत की भूलों और भविष्य की आशाओं के बीच संतुलन स्थापित कर सकता है।




