
अपना घर
कितना प्रिय होता है
पूरी आजादी होती
जैसे मर्जी
वैसे रह सकते हैं
खुली छूट होती है
कोई बंदिश नहीं
एक स्वतंत्र जीवन
किसी का हस्तक्षेप नहीं
अपने घर में
उलट-पलट कर रह सकते हैं
एक जो सुकून मिलता है
एक ताजगी
एक सौन्दर्य का भाव
यह सब मिलता है अपने घर में
…..
जयचन्द प्रजापति ‘जय’
प्रयागराज
कविता का भावार्थ…
यह कविता अपने घर की अनमोलता और स्वतंत्रता पर केंद्रित है। कवि कहते हैं कि अपना घर कितना प्रिय होता है, जहाँ पूरी आजादी मिलती है—जैसे मन में आए वैसे रह सकते हैं, खुली छूट होती है। वहाँ कोई बंदिश या बाहरी हस्तक्षेप नहीं होता, बल्कि एक स्वतंत्र जीवन जी सकते हैं। घर में उलट-पुलट कर रहने की आजादी है, जो अपार सुकून, ताजगी और सौंदर्य का भाव प्रदान करती है। कुल मिलाकर, कविता घर को स्वाधीनता, शांति और सच्ची खुशी का प्रतीक बताती है।




